Friday, 12 July 2013

किसानों को नई राह दिखा गया किसानों का मसीहा

बेजुबानों को बचाने और थाली को जहरमुक्त बनाने के लिए डा. दलाल ने जलाई थी कीट ज्ञान क्रांति की मशाल


डॉ सुरेन्द्र दलाल 
जींद। हरियाणा प्रदेश के जींद जिले के जुलाना हलके के गांव नंदगढ़ में श्री गणेशीराम तथा श्रीमति धनपति देवी के घर अप्रैल 1962 में एक महान विभूति ने जन्म लिया। यह महान विभूति थे कीट साक्षरता के अग्रदूतडा. सुरेंद्र दलाल। डा. सुरेंद्र दलाल के पिता श्री गणेशीराम फौज में सैनिक थे और माता धनपति देवी एक सुशील गृहिणी थी। डा. सुरेंद्र दलाल एक किसान परिवार से सम्बंध रखते थे। डा. सुरेंद्र दलाल की प्रारम्भिक शिक्षा गांव में ही हुई और नौवीं कक्षा तक की पढ़ाई गांव के सरकारी स्कूल से पूरी करने के बाद डा. सुरेंद्र दलाल ने सोनीपत के हिंदू हाई स्कूल से दसवीं की परीक्षा पास की। 3 भाइयों और 2 बहनों में सबसे बड़े होने के कारण छोटे भाइयों और बहनों की पढ़ाई की जिम्मेदारी भी इन्ही के कंधों पर थी। छोटे भाई विजय दलाल, जगत सिंह तथा राजसिंह को पढ़ाने की जिम्मेदारी इन्होंने बखूबी निभाई। घर की अर्थिक स्थित कमजोर होने के कारण छोटे भाइयों को पढ़ाने तथा घर की मूलभूत आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए डा. सुरेंद्र दलाल ने पढ़ाई बीच में ही छोड़कर हिसार में नौकरी शुरू कर दी। इस दौरान 1979 में डा. सुरेंद्र दलाल की शादी हो गई और श्रीमति कुसुम जैसी सुशील और सर्वगुण संपन्न जीवन संगिनी के साथ उन्होंने अपने जीवन का आगे का सफर शुरू किया। श्रीमति कुसुम ने भी हर तरह की परिस्थितियों में डा. सुरेंद्र दलाल का तहदिल से साथ दिया। श्रीमति कुसुम से इन्हें 2 पुत्रियां प्रीतिका, रीतिका तथा एक पुत्ररत्न अक्षत की प्राप्ति हुई। श्रीमति कुसुम की शिक्षा विभाग में नौकरी लग जाने के बाद डा. सुरेंद्र दलाल ने दोबारा से अपना पढ़ाई का सफर शुरू करते हुए अगस्त 1979 में हिसार के कृषि विश्वविद्यालय में बी.एस.सी. (आनर्स) कृषि में दाखिला लिया। 1983 में बी.एस.सी. की पढ़ाई पूरी करने के बाद 1986 में एम.एस.सी. तथा 1991 में इसी विश्वविद्यालय से उन्होंने 
पाठशाला में किसानो को कीटों की जानकारी देते डॉ दलाल 
दूरदर्शन की टीम के साथ बातचीत करते डॉ दलाल 
कपास की फसल में कीटों का अवलोकन करती महिलाएं 
पाठशाला में किसानो को कीटों की जानकारी देते डॉ दलाल 
कपास की फसल में कीटों का अवलोकन करते किसान 
महिला पाठशाला में महिलाओं को कीटों के बारे जानकारी देते डॉ दलाल 
किसान पाठशाला में खाप पर्तिनिधियों को स्मृति चिहन देते किसान 

पौध प्रजनन (Plant Breeding) में पी.एच.डी. की डिग्री हासिल की। इन दोनों ही डिग्रियों के दौरान उन्हें भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) से फैलोशिप भी मिला। हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय में बी.एस.सी. की पढ़ाई के दौरान ही वे प्रगतिशील छात्र संगठन एस.एफ.आई. के सम्पर्क में आए और वामपंथी विचारधारा से जुड़े। डा. सुरेंद्र दलाल ने एस.एफ.आई. के साधारण सदस्य से सफर शुरू करते हुए आगे बढ़कर राज्य अध्यक्ष तक की जिम्मेदारी भी निभाई। डा. सुरेंद्र दलाल का सम्पूर्ण जीवन बड़ा ही संघर्ष भरा रहा और इन्होंने बड़ी से बड़ी कठिनाई का भी डटकर मुकाबला किया। डा. सुरेंद्र दलाल ईमानदार, कठोर परिश्रमी, दृढ़ संकल्प और दूरदर्शी तथा एक अच्छे वक्ता भी थे। वक्तव्य में उनका कोई शानी नहीं था। डा. दलाल प्रत्येक विषय पर गंभीरता से विचार करते हुए उसकी गहराई तक जाते थे। किसानों तथा गरीब वर्ग के प्रति डा. दलाल का विशेष लगाव रहा। इसलिए पढ़ाई के दौरान छात्र आंदोलनों में सक्रिय भूमिका निभाने के साथ-साथ मजदूरों, किसानों और कर्मचारियों के संघर्षों में भी उनका अहम योगदान रहा। पी.एच.डी. की डिग्री लेने के बाद उन्होंने 1992 में हरियाणा एग्रीकल्चर यूनिवॢसटी की ब्रांच कोल (कुरुक्षेत्र) में साइंटिस्ट के तौर पर नौकरी की शुरूआत की। लगभग एक वर्ष तक यहां पौध प्रजनन पर कार्य करने के बाद डा. सुरेंद्र दलाल ने इस नौकरी से त्याग पत्र दे दिया। इसके बाद डा. दलाल ने 1994 में कृषि विभाग में ए.डी.ओ. के पद पर ज्वाइन किया और यहां से ऑन डेपुटेशन साक्षरता अभियान में जुड़कर उन्होंने अनपढ़ महिला और पुरुषों को अक्षर ज्ञान का रसपान करवाकर साक्षर करने का काम किया। डा. सुरेंद्र दलाल के पास सामाजिक सांस्कृतिक और परम्परा को लोगों की चेतना में विकसित करने तथा उन्हें संगठित करने की बेजोड़ कला थी। जींद में अन्य साथियों के साथ मिलकर साक्षरता सत्संग और सांग की रचना करना तथा उनका मंचन करना इसका जीता जागता एक उदाहरण है। वे मुश्किल से मुश्किल विषय को बहुत जल्द लोकभाषा में परिवॢतत कर उसे लोगों के बीच प्रस्तुत करने में भी माहिर थे। वे बड़े ही स्पष्टवादी और हाजिर जवाबी भी थे। लोक इतिहास में उनकी गहरी रुचि थी। भारत के स्वतंत्रता संग्राम के दौरान लिजवाना और आसपास के गांवों के लोगों की भूमिका पर भी उन्होंने शोधपूर्ण कार्य किया। भूरा और निघाइया नम्बरदारों के नेतृत्व में इलाके की जनता द्वारा अंग्रेजों, जींद, पटियाला और नाभा के राजाओं के विरुद्ध किए गए शानदार संघर्ष को उन्होंने नाटक, रागिनी और किस्सों के रूप में जनता के सामने प्रस्तुत किया। उनकी रचनाओं से यह स्पष्ट होता है कि वे एक महान इतिहासकार भी थे। साक्षरता अभियान के माध्यम से लोगों को अक्षर ज्ञान का रसपान करवाने के बाद भी समाजसेवा के प्रति उनकी जिज्ञासा कम होने की बजाए बढ़ती ही चली गई। साक्षरता अभियान के बाद वापिस कृषि क्षेत्र की जिम्मेदारी मिलने पर समाज के प्रति उनका लगाव ओर भी ज्यादा बढ़ता चला गया और उन्होंने अपना पूरा जीवन समाज को समर्पित कर दिया। फसलों में अंधाधुंध रासायनिक उर्वरकों के प्रयोग से थाली में बढ़ते जहर तथा वर्ष 2002 में बी.टी. कपास में फैले अमेरीकन सूंडी के प्रकोप ने उनके जीवन को एक नई दिशा दी। इसके बाद उन्होंने थाली को जहरमुक्त बनाने के लिए कीटों पर अपना शोध शुरू कर दिया। कीटों पर किए गए शोध से वर्ष 2007 में उन्होंने कपास की फसल में अमेरीकन सूंडी का तोड़ ढूंढ़कर पहली सफलता हासिल की और इस कामयाबी में उनके मार्गदर्शक बने रुपगढ़ गांव के किसान। एक तरह से यह उनका बडप्पन ही था कि उन्होंने इसी गांव के कीटाचार्य राजेश नामक किसान को अपना कीट ज्ञान का गुरु मानकर अपने शोधों को गति दी। इसके बाद वर्ष 2008 में जींद जिले के निडाना गांव के खेतों से उन्होंने कीट ज्ञान क्रांति की मशाल जलाकर हरियाणा प्रदेश ही नहीं बल्कि पूरे देश के मानचित्र पर निडाना गांव तथा जींद जिले को एक नई पहचान दिलाई। अपने आप में यह भी एक अनोखी बात है कि पौध प्रजनन पर पी.एच.डी. करने के बावजूद भी उन्होंने कीटों पर शोध कर एक नया अध्याय लिखा। अपनी 6-7 वर्षों की अथक मेहनत के बूते ही उन्होंने देश के किसानों को एक नई दिशा देने का काम किया। कीटों पर शोध करते हुए उन्होंने कपास की फसल में पाए जाने वाले 206 कीटों की पहचान की। इनमें 43 किस्म के शाकाहारी कीट तथा 163 किस्म के मांसाहारी कीट हैं। इन कीटों में से भी चबाकर खाने वाले, रस चूसने वाले, फूल-फल, पत्तियां खाने वाले कीटों की अलग-अलग श्रेणियां बांट दी। यह उनके शोधों का ही परिणाम है कि उन्होंने पिछले 40 वर्षों से किसानों और कीटों के बीच चली आ रही इस लड़ाई को समाप्त करने तथा किसानों को लड़ाई के इस चक्रव्यूह से बाहर निकलने के लिए कीट ज्ञान रूपी एक अचूक हथियार दिया। इतना ही नहीं कीट ज्ञान की क्रांति को तेजी से आगे बढ़ाने के लिए उन्होंने पुरुष किसानों के साथ-साथ महिला किसानों को भी अपनी इस मुहिम में शामिल कर एक अनूठी मिशाल पेश की। डा. दलाल ने जिलेभर के दर्जनभर से ज्यादा गांवों के किसानों को जय कीट ज्ञान के एक सूत्र में पिरो दिया। डा. दलाल के कुशल मार्गदर्शन की बदौलत ही आज जींद जिले के लगभग दर्जनभर से भी ज्यादा गांवों के पुरुष तथा महिला किसान कीट ज्ञान की डिग्री हासिल कर पाए। अपने प्रयोगों की बदोलत ही डा. दलाल तथा यहां के किसानों ने कपास जैसी कमजोर फसल में भी बिना पेस्टीसाइटों का इस्तेमाल किए अच्छा उत्पादन लेकर दुनिया को यह दिखा दिया कि जब कपास जैसी कमजोर फसल बिना पेस्टीसाइड पैदा 
रेडियो पत्रकार सम्पूर्ण सिंह डॉ सुरेन्द्र दलाल से बातचीत करते हुए 
की जा सकती है तो अन्य फसलों में भी बिना पेस्टीसाइड का इस्तेमाल किए अच्छा उत्पादन लिया जा सकता। इसके बाद डा. सुरेंद्र दलाल ने इस मुहिम को तेजी से आगे बढ़ाने के लिए खाप पंचायतों को इस मुहिम से जोडऩे का काम किया। डा. दलाल से मार्गदर्शन लेकर यहां के कीट मित्र किसानों ने वर्ष 2012 में खाप पंचायतों की अदालत में एक अर्जी भेजकर पिछले 40 वर्षों से किसानों और कीटों के बीच चली आ रही इस अंतहीन लड़ाई को समाप्त करवा बेवजह मारे जा रहे बेजुबानों को बचाने की गुहार लगाई। बड़े-बड़े विवाद सुलझाने के लिए मशहूर रही खाप पंचायतों ने किसानों की इस अर्जी को स्वीकार करते हुए उन्हें सही न्याय करने के लिए आश्वस्त किया। इस विवाद में खाप पंचायतों द्वारा हस्तक्षेप किए जाने के बाद आधुनिकता के इस दौर में फतवे जारी करने तथा तालिबानी फरमान सुनाने के नाम से बदनाम हो चुकी खाप पंचायतों का एक सामाजिक चेहरा फिर से लोगों के सामने आया। खाप पंचायतों के प्रतिनिधियों ने कीटाचार्य किसानों के निमंत्रण को स्वीकार कर इस अंतहीन लड़ाई को खत्म करने के लिए लगातार 18 सप्ताह तक किसान खेत पाठशालाओं में पहुंचकर कीट ज्ञान अर्जित किया। इन 18 सप्ताह के दौरान प्रदेशभर की लगभग 90 खापों के प्रतिनिधि कीट अवलोकन के लिए इन पाठशालाओं में पहुंचे। डा. सुरेंद्र दलाल ने अपनी समग्र दृष्टि का प्रयोग करते हुए खाप पंचायतों के माध्यम से किसानों में कीट ज्ञान का खूब प्रचार किया। इसी का परिणाम था कि खेती के क्षेत्र में समृद्ध हो चुके पंजाब जैसे प्रदेश के किसान भी यहां के किसानों से कीट ज्ञान के गुर सीखने के लिए समय-समय पर यहां पहुंचने लगे। इतना ही नहीं डा. दलाल ने टैक्रालाजी के इस युग को देखते हुए ब्लाग तथा इंटरनेट के माध्यम से विदेशों में भी कीटनाशक रहित खेती की अलख जगाई। डा. दलाल ने प्रभात कीट पाठशाला, निडाना गांव का गौरा, अपना खेत अपनी पाठशाला, महिला खेत पाठशाला, कृषि चौपाल, नौगामा ब्लाग तथा यू-ट्यूब पर भी कीटों की क्रियाकलापों की वीडियों डालकर विदेशियों का ध्यान इस तरफ अकर्षित किया। अपने स्वास्थ्य की परवाह नहीं करते हुए कीट साक्षरता के इस अग्रदूत ने कीट ज्ञान की इस क्रांति को एक विकल्प के रूप में किसानों के बीच स्थापित कर दिया। दुर्भाग्यवश फरवरी 2013 में डा. सुरेंद्र दलाल स्वाइन फ्लू की चपेट में आ गए। डा. दलाल को उपचार के लिए हिसार के जिंदल अस्पताल में भर्ती करवाया गया। यहां पर वैल्टीनेटर की सुविधा मुहैया नहीं हो पाने के कारण चिकित्सकों ने डा. दलाल को हिसार के ही गीतांजलि अस्पताल में रैफर कर दिया लेकिन यहां पर वह सघन कोमा में चले गए। इसके बाद डा. दलाल को दिल्ली के फोर्टिज अस्पताल में ले जाया गया। लगभग 3 माह तक अस्पताल में जिंदगी और मौत के बीच जूझने के बाद आखिरकार कीट साक्षरता के अग्रदूत डा. सुरेंद्र दलाल दुनिया से विदा हो गए। अपना सबकुछ दाव पर लगाकर किसानों को जगाने वाला किसानों का यह मसीहा हमेशा-हमेशा के लिए सौ गया। 18 मई 2013 को डा. सुरेंद्र दलाल ने हिसार के जिंल अस्पताल में आखिरी सांस ली। डा. दलाल को बचाने के लिए 3 माह तक परिवार के सदस्यों द्वारा की गई अथक मेहनत, बड़े-बड़े डाक्टरों की दवाएं तथा देशभर से डा. दलाल के शुभचिंतकों की दुवाएं भी बेअसर हो गई। 19 मई 2013 को उनके पैतृक गांव नंदगढ़ में हजारों लोगों ने नम आंखों के साथ उन्हें अंतिम विदाई दी। उनकी अंतिम यात्रा के दौरान पूरा नंदगढ़ गांव अपने इस डाक्टर के लिए फफक-फफक कर रो रहा था। चारों तरफ से उमड़ रहे आंसुओं के सैलाब के कारण गांव का माहौल पूरी तरह से गमगीन था और हर चेहरे पर इस महान विभूति को खो देने का दर्द साफ झलक रहा था। डा. दलाल के चले जाने से अकेले हरियाणा प्रदेश  ही नहीं बल्कि पूरे देश को बड़ी क्षति हुई है। यह क्षति कभी पूरी नहीं हो सकती। आज भले ही डा. दलाल हमारे बीच प्रत्यक्ष रूप से मौजूद नहीं हों लेकिन अप्रत्यक्ष रूप से वे हमारे बीच हर वक्त मौजूद रहेंगे। उनके अनुभव, उनका कीट ज्ञान का संदेश, उनके विचार, उनकी जीवनशैली, उनका स्पष्टवादी व्यवहार, समाज के प्रति उनका समर्पण हमेशा हमें अपने बीच उनका एहसास करवाता रहेगा। उनके द्वारा दिया गया एक-एक संदेश हमेशा हमारे कानों में गुंजता रहेगा। वो सदा-सदा के लिए हमारे दिलों में बस गए हैं। दुनिया की कोई भी ताकत, कोई भी लालसा, उन्हें हमारे दिलो-दिमाक से नहीं निकाल पाएगी। उनकी इस मुहिम को आगे बढ़ाना ही उनको सच्ची श्रद्धांजलि होगी।


जय जवान जय किसान जय कीट ज्ञान  

Wednesday, 10 July 2013

जहरमुक्त खेती की मुहिम को आगे बढ़ाने के लिए कृषि विभाग ने किसानों की तरफ बढ़ाया हाथ

रधाना में महिला तथा निडानी में पुरुष किसानों की खेत पाठशालाएं शुरू 


जींद। कीट साक्षरता के अग्रदूत डा. सुरेंद्र दलाल द्वारा थाली को जहरमुक्त करने के लिए जींद जिले में शुरू की गई कीट ज्ञान की मुहिम को आगे बढ़ाने के लिए अब कृषि विभाग ने भी जिले के किसानों की तरफ हाथ बढ़ाया है। जिले के किसानों को कीटों की पहचान करवाकर जहरमुक्त खेती की तरफ आकर्षित करने के लिए कृषि विभाग द्वारा भारत सरकार की मिनी टैक्रोलोजी मिशन-2 योजना के तहत बुधवार को जिले के रधाना गांव में महिला किसान खेत पाठशाला तथा निडानी गांव में पुरुष किसान खेत पाठशाला का शुभारंभ किया गया। डा. सुरेंद्र दलाल की पत्नी कुसुम दलाल ने महिला तथा पुरुष किसानों को राइटिंग पैड, पैन तथा सुक्ष्मदर्शी लैंस देकर पाठशाला का शुभारंभ किया। इस अवसर पर पाठशाला में कृषि विभाग के जिला उप-निदेशक डा. रामप्रताप सिहाग भी विशेष रूप से मौजूद थे। 
 किसानों को राइटिंग पैड तथा पैन वितरित करती कुसुम दलाल।
 फसल में कीटों का अवलोकन करती महिला किसान।
मैडम कुसुम दलाल ने कहा कि डा. सुरेंद्र दलाल ने जिले के किसानों के साथ मिलकर जहरमुक्त खेती की जो मुहिम शुरू की है, उसे आगे बढ़ाने के लिए उनका परिवार हर वक्त किसानों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़ा रहेगा। कृषि उप-निदेशक डा. राम प्रताप सिहाग ने किसानों को मिनी टैक्रोलोजी मिशन के बारे में जानकारी देते हुए महिला तथा पुरुष किसानों को कीटों की पहचान करने तथा उनके क्रियाकलापों को समझने के लिए प्रेरित किया। डा. सिहाग ने कहा कि डा. सुरेंद्र दलाल तथा जींद के किसानों द्वारा कीटों पर जो शोध किए गए हैं, अब वैज्ञानिक ने भी किसानों के इस शोध पर अपनी सहमती की मोहर लगा दी है। उन्होंने कहा कि कीटों को न तो नियंत्रित करने की जरुरत है और न ही इन्हें मारने की। अगर जरुरत है तो इन्हें पहचानकर इनके क्रियाकलापों के बारे में ज्ञान हासिल करने की। डा. सिहाग ने कहा कि कपास की फसल में आने वाले जिस मिलीबग नामक कीट का नाम सुनकर बड़े-बड़े किसानों के पसीने छूटने लगते थे, उस मिलीबग को तो यहां के किसानों से आल-गोल कीट साबित कर दिया है। मिलीबग को कंट्रोल करने के लिए किसी कीटनाशी की जरुत नहीं पड़ती। इसे काबू करने के लिए तो कपास की फसल में अंगीरा, जंगीरा तथा फंगिरा नामक कूदरती कीटनाशी काफी संख्या में मौजूद होते हैं। इसके अलावा कपास की फसल में आने वाली सफेद मक्खी, हरा तेला तथा चूरड़े नामक शाकाहारी कीट से भी फिलहाल कपास की फसल को कोई खतरा नहीं है। यहां के किसानों ने सफेद मक्खी, चूरड़ा तथा हरेतेले का जो सर्वेक्षण किया है उसके आधार पर यह कीट अभी तक नुक्सान पहुंचाने के स्तर से काफी दूर हैं। जिला पौध संरक्षण अधिकारी अनिल कुमार व कृषि विकास अधिकारी डा. कमल सैनी ने बताया कि वैज्ञानिक भी यही मानते हैं कि सफेद मक्खी की संख्या यदि प्रति पौधा 6 से अधिक है, हरे तेले की संख्या प्रति पौधा 2 तथा चूरड़े की संख्या प्रति पौधा 10 से अधिक आती है तो ही यह कीट फसल में कुछ नुक्सान पहुंचा सकते हैं लेकिन अभी तक इनका आंकड़ा इस स्तर से काफी नीचे है। इसलिए किसानों को इन कीटों से भयभीत होने 
 पाठशाला में कीटों का बही खाता तैयार करती महिला किसान। 
की जरुरत नहीं है। इस अवसर पर उनके साथ कृषि विभाग से एस.एम.एस. युद्धवीर सिवाच, ए.डी.ओ. रवि कादियान, राजेंद्र शर्मा, सनुील दलाल तथा डा. सुरेंद्र दलाल के पुत्र अक्षत दलाल भी विशेष रूप से मौजूद थे। 

फसल के उत्पादन में पौधों की संख्या का योगदान 

निडानी के किसानों ने हवन कर पाठशाला का शुभारंभ किया। इसके बाद जिस खेत में पाठशाला का शुभारांभ किया उस खेत में मौजूद कपास की फसल के पौधों की गिनती की। डा. कमल सैनी ने बताया कि किसी भी फसल के उत्पादन में पौधों की संख्या का सीधा-सीधा योगदान होता है। यहां के किसानों ने जिस खेती के पौधों की गिनती की है, उस खेत में कुल 4436 पौधे हैं, जो की फसल के अच्छे उत्पादन के लिए उपयुक्त हैं। 

Monday, 8 July 2013

चूल्हे-चौके के साथ साथ महिला किसानों को कीट ज्ञान का पाठ पढ़ाएंगी कीटों की मास्टरनियां

सप्ताह के हर बुधवार को रधाना गांव में किया जाएगा महिला किसान खेत पाठशाला का आयोजन 


जींद। थाली को जहरमुक्त करने की मुहिम को आगे बढ़ाने के लिए कीटों की मास्टरनियां अब आस-पास के गांवों की महिलाओं को भी कीट ज्ञान का पाठ पढ़ाएंगी। तक सीमित रहने वाली महिलाओं को खेती किसानी के कार्य में निपुर्ण करने के लिए ललीतखेड़ा, निडाना तथा निडानी की महिलाओं द्वारा कीट साक्षरता के अग्रदूत डा. सुरेंद्र दलाल के नाम से सप्ताह के हर बुधवार को रधाना गांव में महिला किसान खेत पाठशाला का आयोजन किया जाएगा। इस पाठशाला में रधाना गांव के साथ-साथ आस-पास के गांवों की महिलाओं को भी कीटों की पहचान करवाकर जहरमुक्त खेती के टिप्स दिए जाएंगे। महिलाओं की इस मुहिम को आगे बढ़ाने के लिए कृषि विभाग द्वारा भी विशेष सहयोग दिया जाएगा। 
फसलों में अंधाधुंध रासायनिक उर्वरकों के प्रयोग के कारण किसानों पर बढ़ते खर्च तथा रासायनिक उर्वरकों के अधिक प्रयोग से हो रही जीव हत्या को देखते कीट साक्षरता के अग्रदूत डा. सुरेंद्र दलाल ने 2008 में निडाना गांव से कीट ज्ञान क्रांति की मुहिम का शंखनाद किया था। डा. सुरेंद्र दलाल ने यहां के किसानों को फसल में मौजूद कीटों की पहचान करवाने के साथ-साथ कीटों के क्रियाकलापों पर गहन शोध किया था। किसानों द्वारा किए गए शोध में यह सिद्ध हो चुका है कि कीट फसल में न तो हानि पहुंचाने के लिए आते हैं और न ही लाभ पहुंचाने के लिए आते हैं। कीट तो फसल में केवल अपना जीवन यापन करने के लिए आते हैं। इसके बाद इस मुहिम को तेजी से आगे बढ़ाने के लिए डा. सुरेंद्र दलाल ने महिलाओं को इस मुहिम में शामिल किया और वर्ष 2010 में निडाना गांव से ही पहली महिला किसान खेत पाठशाला की शुरूआत की। इसके बाद महिलाओं ने भी कीटों पर गहन अध्ययन किया और इसके बाद 2012 में ललीतखेड़ा से महिला किसान खेत पाठशाला की शुरूआत की। इस प्रकार निडाना, निडानी तथा ललीतखेड़ा गांव की 2 दर्जनभर
 ललीतखेड़ा गांव के खेतों में चल रही महिला पाठशाला का फाइल फोटो। 
 कीटों की मास्टरनियों के फोटो। 
के लगभग महिलाएं कीट ज्ञान का अध्ययन करते-करते कीटों की मास्टरनियां बन गई। अब कीटों की इन मास्टरनियों ने थाली को जहरमुक्त करने की इस मुहिम को आगे बढ़ाने के लिए आस-पास के गांवों की महिलाओं को कीट ज्ञान का पाठ पढ़ाने का निर्णय लिया है। निडाना, निडानी, ललीतखेड़ा गांव की इन वीरांगनाओं द्वारा सप्ताह के हर बुधवार को रधाना गांव के जगमेंद्र के खेत में पाठशाला का आयोजन किया जाएगा। 18 सप्ताह तक पाठशालाएं चलेंगी और इन पाठशालाओं में रधाना तथा आस-पास के गांवों की महिलाओं को फसल में मौजूद शाकाहारी तथा मांसाहारी कीटों की पहचान करवाने तथा कीटों के क्रियाकलापों की जानकारी देकर जहरमुक्त खेती के टिप्स दिए जाएंगे। कीटाचार्या पूनम मलिक, सविता मलिक, मीनी मलिक, गीता, कमलेश, राजवंती, बिमला तथा अंग्रेजो ने बताया कि किसान अधिक उत्पादन की चाह में फसलों में बेहता रासायनिक उर्वरकों का प्रयोग कर रहे हैं। फसल में अधिक उर्वरकों के प्रयोग से खेती किसानों के लिए घाटे का सौदा बनती जा रही है। महिलाओं ने बताया कि अधिकतर किसानों को तो कीट तथा बीमारियों के बीच के अंतर के बारे में ही जानकारी नहीं है और जानकारी के अभाव में किसान भय व भ्रम के जाल में फंसकर बेजुबान कीटों की हत्या कर रहे हैं। इससे हमारे पर्यावरण के साथ-साथ हमारा खान-पान भी जहरीला होता जा रहा है। उन्होंने कहा कि अगर किसानों को भय व भ्रम के इस चक्रव्यूह से बाहर निकलना है तो उन्हें कीट ज्ञान का सहारा लेना होगा। कीटों की मास्टरनियों की इस मुहिम को आगे बढ़ाने के लिए कृषि विभाग द्वारा भी विशेष सहयोग दिया जाएगा।

जहरमुक्त खेती की मुहिम को आगे बढ़ाने के लिए विभाग ने तैयार की योजना

निडाना, निडानी तथा ललीतखेड़ा गांव की महिलाएं कीट ज्ञान के बूते पिछले 2-3 वर्षों से अच्छा उत्पादन ले रही हैं। इन महिला किसानों द्वारा अपनी फसलों में एक छटांक भी जहर का इस्तेमाल नहीं किया जाता। इन महिलाओं की सफलता को देखते हुए कृषि विभाग ने इस मुहिम को पूरे जिले तथा जिले से बाहर फैलाने के लिए योजना तैयार की है। विभाग द्वारा आस-पास के गांवों में महिलाओं की पाठशालाएं लगवाई जाएंगी और उन पाठशालाओं में निडाना, निडानी तथा ललीतखेड़ा की महिलाओं को पढ़ाने के लिए भेजा जाएगा। इस सप्ताह से रधाना गांव में महिला पाठशाल का शुभारंभ किया जा रहा है। यहां पर महिलाओं को तकनीकी ज्ञान देने के लिए कृषि विभाग के अधिकारियों की ड्यूटी भी लगाई जाएगी। 
डा. रामप्रताप सिहाग, उप-निदेशक
 कृषि विभाग, जींद

Sunday, 7 July 2013

सफेद मक्खी का सबसे बड़ा भस्मासुर फलहारी बुगाडा

फलहारी बुगडे ने दी कपास की फसल में दस्तक 


जींद। कृषि विभाग के जिला उप-निदेशक डा. रामप्रताप सिहाग ने कहा कि जींद जिले के किसानों ने कीटों पर शोध का जो कार्य शुरू किया है, वह अपने आप में एक अनोखी पहल है। आज तक पूरे देश में कीटों पर इस तरह से कहीं भी शोध नहीं हुआ है। डा. सिहाग शनिवार को राजपुरा गांव के खेतों में आयोजित डा. सुरेंद्र दलाल किसान खेत पाठशाला के तीसरे सत्र में बतौर मुख्यातिथि किसानों को सम्बोधित कर रहे थे। इस अवसर पर उनके साथ कामरेड फूलकुमार श्योकंद, ए.डी.ओ. डा. कमल सैनी भी विशेष रूप से मौजूद थे। पाठशाला में आसपास के 12 गांवों के किसानों ने अपनी अनुपस्थिति दर्ज करवाई। 
  पाठशाला में किसानों को सम्बोधित करते डी.डी.ए. डा. आर.पी. सिहाग।
कामरेड फूलकुमार श्योकंद ने कहा कि अगर किसानों को जहर से निजात हासिल करनी है तो उन्हें डा. सुरेंद्र दलाल द्वारा दिखाए गए कीट ज्ञान के रास्ते पर आगे बढ़कर कीटों के जीवनचक्र पर गहराई से अध्ययन करना होगा। श्योकंद ने कहा कि देश में जब हरित क्रांति ने दस्तक दी थी तो उसके साथ ही फसलों में रासायनिक उर्वरकों का प्रयोग भी तेजी से होने लगा था। इसके चलते 1975-76 में वैज्ञानिकों ने रासायनिक उर्वरकों से मनुष्य के स्वास्थ्य पर होने वाले कूप्रभाव पर खोज शुरू की थी। उस समय इस खोज पर लगभग 1900 वैज्ञानिक कार्य कर रहे थे लेकिन समय के साथ-साथ आज यह खोज बंद होती चली गई। पाठशाला के आरंभ में किसानों ने कीट अवलोकन किया और इसके बाद कीट बही खाता तैयार किया। किसानों ने बताया कि कपास के इस खेत में सफेद मक्खी की औसत प्रति पत्ता 2.7, हरे तेले की 1.7 और चूरड़े की 3.3 की औसत है। उन्होंने कहा कि अगर आंकड़े पर नजर डाली जाए तो इस वक्त सफेद मक्खी, हरा तेला और चूरड़ा फसल को नुक्सान पहुंचाने के सत्र से काफी नीचे है। किसानों ने बताया कि उन्होंने कीट अवलोकन के दौरान क्राइसोपा के अंडे, बच्चे और प्रौढ़ नजर आया। इसके अलावा फलहरी बुगड़ा, लेडी बर्ड बीटल, हंडेर बीटल, अंगीरा नामक मांसाहारी कीट भी फसल में मौजूद थे। किसान बलवान, रमेश, महाबीर, सुरेश ने बताया कि फलहरी बुगड़ा लाल रंग का होता है डेढ़ मिनट में 1 कीड़े का काम तमाम कर देता है। अगर हमारी फसल में फलहरी बुगड़ा मौजूद है तो हमें सफेद मक्खी से डरने की जरुरत नहीं है। लेडी बर्ड बीटल 17-18 किस्मों की होती हैं तथा अपने शरीर के बराबर तक के कीटों का मांस खा कर गुजारा करती हैं। अंगीरा एक मांसाहारी कीट है तथा मिलीबग के पेट में अपने अंडे देता है। अंगीरा के बच्चे मिलीबग को अंदर से खाना शुरू करते हैं। इससे मिलीबग का रंग गहरा लाल होना शुरू हो जाता है और धीरे-धीर वह नष्ट हो जाती है। एक अंगीरा अपनी ङ्क्षजदगी में लगभग 100 मिलीबग का काम तमाम कर देता है। हंडेर बीटल जमीन के अंदर रहकर जमीन को खोदती हैं। हंडेर बीटल एक प्रकार से फसल में निराई-गुडाई का काम करती हैं तथा बरसात के दिनों में जमीन में पानी अधिक होने के कारण यह जमीन से बाहर निकलती हैं। जमीन के बाहर आकर यह शाकाहारी कीटों को अपना शिकार बनाती हैं। 

सही होनी चाहिए जमीन की पी.एच.

डा. कमल सैनी ने कहा कि फसल की पैदावार जमीन की पी.एच. पर निर्भर करती है। अगर जमीन की पी.एच. 6.5 से 7.5 के बीच है तो वह जमीन कृषि के लिए सबसे उपयुक्त होती है। इस तरह की जमीन में किसी भी तरह का उर्वरक डालने की जरुरत नहीं होती। अगर जमीन की पी.एच. ज्यादा हो तो पौधा फासफोरस तथा सल्फर को तो जमीन से आसानी से ले लेगा लेकिन बाकी पोषक तत्वों का वह प्रयोग करने में सक्ष्म नहीं होगा।  

 कपास के पौधों पर कीटों का अवलोकन करते किसान।



Thursday, 4 July 2013

कपास की फसल में महिलाओं ने ढूंढ़े कुदरती कीटनाशी

शाकाहारी कीटों को नियंत्रित करने के लिए मांसाहारी कीटों ने दी फसल में दस्तक


फसल में अवलोकन के दौरान महिलाओं को मिला मांसाहारी कीट क्राइसोपा का अंड़ा।
फसल में कीटों का अवलोकन करती महिलाएं।
जींद। कीटाचार्या सविता मलिक ने कहा कि किसानों को अपनी कपास की फसल में मौजूद शाकाहारी कीटों से घबराने की जरुरत नहीं है। शाकाहारी कीटों को नियंत्रित करने के लिए कपास की फसल में अब मांसाहारी कीटों ने भी दस्तक दे दी है। सविता वीरवार को ललीतखेड़ा गांव के खेतों में आयोजित डा. सुरेंद्र दलाल महिला किसान खेत पाठशाला के दूसरे सत्र के दौरान पाठशाला में मौजूद महिलाओं को कीट ज्ञान का पाठ पढ़ा रही थी। इस अवसर पर बागवानी विभाग के जिला अधिकारी डा. बलजीत भ्याण, कृषि विभाग के ए.डी.ओ. डा. कमल सैनी, डा. शैलेंद्र चहल तथा डा. नेम कुमार भी विशेष रूप से मौजूद थे। पाठशाला की शुरूआत में महिलाओं ने कपास की फसल में मौजूद कीटों का अवलोकन किया। कीट अवलोकन के दौरान महिलाओं ने कपास की फसल में क्राइसोपा का अंडे भी देखे।
सविता मलिक ने कहा कि फसल में शाकाहारी तथा मांसाहारी 2 प्रकार के कीट होते हैं। पहले शाकाहारी कीट आते हैं तो उसके बाद उनको नियंत्रित करने के लिए मांसाहारी कीट आते हैं। मलिक ने कहा कि पिछले सप्ताह पाठशाला में कीट अवलोकन के दौरान फसल में सफेद मक्खी, हरा तेला तथा चूरड़ा नामक शाकाहारी कीट नजर आए थे लेकिन इस पाठशाला में उन्हें क्राइसोपा के साथ-साथ कुछ अन्य मांसाहारी कीट भी नजर आए हैं, जो शाकाहारी कीटों को नियंत्रित करने में किसानों की सहायता करते हैं और किसानी भाषा में इन्हें कुदरती कीटनाशी के नाम से भी जाना जाता है। शीला ने बताया कि क्राइसोपा का बच्चा सफेद मक्खी, हरे तेले और चूरड़े को अपना भोजन बनाता है तथा 
पाठशाला में महिलाओं को कीट ज्ञान का पाठ पढ़ाती कीटाचार्या।
इसका प्रौढ़ हर प्रकार के शाकाहारी कीट को अपना शिकार बनाता है। अगर फसल में प्रति पौधा एक भी क्राइसोपा मौजूद हो तो वह फसल में शाकाहारी कीटों को नियंत्रित करने में काफी है। कीटाचार्या अंग्रेजो, राजवंती ने बताया कि कीट अवलोकन के दौरान फसल में उन्हें शाकाहारी कीट मिलीबग के अलावा अंगीरा, डायन मक्खी तथा लाल चिचड़ी नामक मांसाहारी कीट भी नजर आए। अंगीरा मिलीबग के पेट में अपने अंडे देता है और इस प्रकार अंगीरा के बच्चों के पालन-पोषण में मिलीबग का काम तमाम हो जाता है। इसी प्रकार लाल चिचड़ी खून चूसकर मिलीबग का खात्मा करती है तथा डायन मक्खी फसल में अपना मचान बनाकर शाकाहारी कीटों का शिकार करती है। डायन मक्खी अपने डंक से शिकार के शरीर में एक अजीब तरह का तरल पदार्थ छोड़ती है और फिर उसके मास को उस तरल पदार्थ में मिलाकर उसके मास को डंक की सहायता से चूसती है। इस अवसर पर महिलाओं ने कीटों का बही खाता भी तैयार किया। इसमें सफेद मक्खी की औसत प्रति पत्ता 1.9, हरा तेला 1.3 तथा चूरड़ा 2.9 की थी। डा. कमल सैनी ने कहा कि बही खाते के आंकड़े के अनुसार अभी तक कपास के इस खेत में कोई भी कीट फसल को नुक्सान पहुंचाने के आंकड़े से कोसों दूर है। निडाना गांव की महिलाओं ने महिला किसान खेत पाठशाला को सुचारू रूप से चलाने के लिए 1100 रुपए की  सहायता दी।  

Wednesday, 3 July 2013

कुदरत के साथ छेड़छाड़ रोकनी है तो कीट ज्ञान हासिल करें किसान : ढुल

किसान खेत पाठशाला के दूसरे सत्र में किसानों को फसल में नजर आए नए कीट


जींद। पृथ्वी पर जीवन यापन के लिए मौजूद सभी सुविधाएं कुदरत का इंसान को एक अनोखा तोहफा हैं लेकिन आज इंसान अपने स्वार्थ के वशीभूत होकर कुदरत के इस अनमोल तोहफे के साथ खिलवाड़ कर रहा है। इसलिए भविष्य में इंसान को इसके गंभीर परिणाम भुगतने के लिए भी तैयार रहना होगा। अगर किसानों को कुदरत का साथ देना है तो उन्हें कीट ज्ञान हासिल करना होगा। यह बात ढुल खाप के प्रधान इंद्र सिंह ढुल ने शनिवार को राजपुरा भैण गांव में आयोजित डा. सुरेंद्र दलाल कीट साक्षरता किसान खेत पाठशाला के दूसरे सत्र के दौरान किसानों को सम्बोधित करते हुए कही। इस अवसर पर उनके साथ चहल खाप के प्रतिनिधि दलीप सिंह चहल और डा. सुरेंद्र दलाल के पुत्र अक्षत भी मौजूद थे। पाठशाला की अध्यक्षता बराह तपा के प्रधान कुलदीप ढांडा ने की तथा संचालन कृषि विकास अधिकारी डा. कमल सैनी ने किया। पाठशाला में राजपुरा भैण, ईंटल कलां, ईंटल खुर्द, निडाना, निडानी, रधाना, ईगराह, रामराये, चाबरी, ललीतखेड़ा सहित दर्जनभर गांवों के किसानों ने कपास की फसल में मौजूद कीटों पर रिसर्च किया। पाठशाला के आरंभ में सभी किसानों ने कीट बही खाता तैयार करने के लिए कपास की फसल में मौजूद मांसाहारी तथा शाकाहारी कीटों का आंकड़ा दर्ज किया। 
पाठशाला के आरंभ में किसानों ने फसल में कीटों का अवलोकन कर कीट बही खाता तैयार किया। कीट बही खाते में सफेद मक्खी की औसत प्रति पत्ता 1.9, हरे तेले की 1.8 और चूरड़े की 2.5 थी। किसानों ने बताया कि कीट बही खाते के अनुसार फसल में मौजूद शाकाहारी कीट कृषि वैज्ञानिकों द्वारा तैयार की गई लक्ष्मण से कोसों दूर हैं। किसानों ने बताया कि शाकाहारी कीटों के साथ-साथ फसल में मांसाहारी कीट क्राइसोपा, क्राइसोपा के अंडे, फलहेरी बुगड़ा, बिंदुआ बुगड़ा, हंडेर बीटल तथा मकड़ी भी काफी संख्या में मौजूद हैं। उन्होंने बताया कि इस बार कपास की फसल में कुछ नए कीट सलेटी भूंड, सुरंगी कीड़ा, टीडा भी नजर आए हैं। किसानों ने बताया कि कपास के इस खेत में कुल 4355 पौधे हैं और प्रति पौधा एक मांसाहारी कीट क्राइसोपा भी मौजूद है। एक क्राइसोपा 40 मिनट में 30 हरे तेलों तथा बुगड़े ढेड मिनट में 1 कीड़े का काम तमाम कर देते हैं। उन्होंने बताया कि कपास की फसल में किए गए रिसर्च के दौरान वह 43 किस्म के शाकाहारी तथा 161 किस्म के मांसाहारी कीटों की पहचान कर चुके हैं। डा. कमल सैनी ने बताया कि पृथ्वी पर सबसे पहले पौधों की उत्पति हुई थी। इसके बाद धरती पर कीटों ने दस्तक दी थी। क्योंकि जीवों को जीवित रहने के लिए आक्सिजन की जरुरत होती है और आक्सिजन की उत्पति का केवल एक मात्र साधन हैंपौधे। बिना पौधों के धरती पर जीवन संभव नहीं है। पृथ्वी पर पौधों की लगभग 3 लाख किस्म की प्रजातियां हैं। इनमें से अढ़ाई हजार किस्म के पौधों को किसान फसलों के रूप में जानते हैं । 
 पाठशाला के आरंभ में कीट बही खाता तैयार करने के लिए फसल में कीटों का अवलोकन करते किसान। 
डा. सैनी ने कहा कि फिजिक्स का नियम कहता है कि पृथ्वी पर जो वस्तु पैदा हुई है, वह कभी भी खत्म नहीं होती।  वह तो बस समय-समय पर अपना आकार बदलती रहता है। पृथ्वी में ऐसे सुक्ष्म जीवाणु हैं जो मृत जीव या बेकार की वस्तु को दोबारा से तोडफ़ोड़कर उसकी वास्तविक स्थिति में बदल देते हैं। प्रकृति अपने नियमानुसार ही किसी जीव को पैदा और नष्ट करती है। इसलिए हमें प्रकृति के साथ ज्यादा छेड़छाड़ करने की जरुरत नहीं है।उन्होंने कहा कि किसान भय व भ्रम के जाल में फंसकर कीटों को मारने में लगे हुए हैं, जबकि सच्चाई यह है कि कीड़ों को मारने की जरुरत नहीं है। अगर जरुरत है तो कीड़ों को पहचानने और उनके क्रियाकलापों को समझने की। जो केवल कीट ज्ञान से संभव है। बिना कीट ज्ञान के किसान भय व भ्रम की स्थिति से बाहर नहीं निकल सकते। उन्होंने कहा कि एक ताजा रिपोर्ट के अनुसार अमेरीका ने तो प्रकृति के साथ बढ़ती छेड़छाड़ को रोकने के लिए पौधों के साथ किसी भी प्रकार की छेडख़ानी करने पर पूर्ण रूप से प्रतिबंध लगा दिया है। कीटाचार्य मनबीर रेढ़ू और रामदेवा ने बताया कि कीट इंसान से ज्यादा ताकतवर होते हैं। इसलिए वह अपने ऊपर आने वाली विपत्ति को पहले ही भांप लेते हैं और अपने वंश को बचाने के लिए अपना जीवन चक्र छोड़ा कर अपने अंड़े देने की क्षमता में वृद्धि कर लेते हैं। उन्होंने सफेद मक्खी का उदहारण देते हुए कहा कि सफेद मक्खी का जीवन काल 72 दिन का होता है और यह एक सप्ताह में 100 से 150 अंडे देती है लेकिन आपदा के समय सफेद मक्खी अपने जीवनकाल को छोटा कर 21 दिन का कर लेती है। 

 पाठशाला में किसानों को सम्बोधित करते कृषि अधिकारी तथा मौजूद किसान।

हरियाणा विद्यालय बोर्ड की लापरवाही

10वीं और 12वीं की रि-अपीयर के फार्म भरने वाले विद्यार्थी हुए परेशान
बोर्ड की वेबसाइट से रि-अपीयर का लिंक गायब


जींद। हरियाणा विद्यालय शिक्षा बोर्ड के अधिकारियों की लापरवाही के कारण हजारों विद्यार्थियों को परेशानी का सामना करना पड़ रह है। बोर्ड की नई योजना के तहत 10वीं तथा 12वीं के रि-अपीयर विद्यार्थियों को अपना फार्म ऑनलाइन भरना है, लेकिन बोर्ड की साइट में रि-पीयर फार्म भरने का लिंक ही नजर नहीं आ रहा है। यह लिंक 18 से 28 जून तक तो नजर आया लेकिन अब गायब है। रि-अपीयर फार्म अप्लाई करने की अंतिम तिथि 6 जुलाई है लेकिन लिंक नहीं होने के कारण हजारों विद्यार्थी यह फार्म अप्लाई नहीं कर पा रहे हैं। बोर्ड नियमों के अनुसार जो विद्यार्थी 6 जुलाई तक फार्म अप्लाई नहीं कर पाए तो उसके बाद उनको जुर्माना लगेगा। यह जुर्माना एक हजार रुपए तक हो सकता है। यदि फिर भी फार्म अप्लाई नहीं हो सका तो विद्यार्थी परीक्षा में बैठने से वंचित रह सकते हैं।
गौरतलब है कि अब से पहले हरियाणा विद्यालय शिक्षा बोर्ड में रि-अपीयर के फार्म डाक द्वारा भेजे जाते थे। इस वर्ष से बोर्ड ने नई सुविधा दी है। इसके तहत जिन विद्यार्थियों की 10वीं तथा 12वीं कक्षा में रि-अपीयर है, वे बोर्ड की साइट पर जाकर ऑनलाइन आवेदन कर सकते हैं। विद्यार्थियों को निर्धारित फीस बोर्ड के अकाउंट, जो कि पंजाब नेशनल बैंक का है, में जमा करवानी है तथा इसकी डिटेल साइट पर भरनी है। बोर्ड की साइट पर रि-अपीयर के लिए फार्म भरने का लिंक दिया हुआ है जोकि अब पूरी तरह से गायब हो चुका है। पिछले 4 दिन से विद्यार्थी इस लिंक को ढूंढ रहे हैं और साइबर कैफे के चक्कर लगा रहे हैं लेकिन यह लिंक नहीं मिल रहा है। 18 जून से 28 जून तक को यह लिंक मिला लेकिन उसके बाद गायब हो गया। हजारों विद्यार्थी फार्म अप्लाई करने के लिए भटक रहे हैं। इस बारे में बोर्ड अधिकारी व कर्मचारी को संतोषजनक जवाब नहीं दे पा रहे हैं। उनका कहना है कि यह टैक्निकल फाल्ट है, जो जल्द ही ठीक कर दिया जाएगा लेकिन कब तक ठीक होगा, यह पता नहीं है। यदि 6 जुलाई के बाद यह ठीक होता है, तो विद्यार्थियों पर जुर्माना लगना तय है, जिसका खामियाजा अभिभावकों को भुगतना पड़ेगा। बोर्ड की लापरवाही के कारण
हरियाणा बोर्ड की साईट का फोटो 
हजारों अभिभावक ठगे जाएंगे।

टोल फ्री नंबर भी दे गया जवाब

हरियाणा विद्यालय शिक्षा बोर्ड ने विद्यार्थियों तथा अभिभावकों की सुविधा के लिए एक टोल फ्री नंबर दिया गया है ताकि किसी भी समस्या के लिए विद्यार्थी तथा अभिभावक इस पर संपर्क करके अपनी समस्या का समाधान करवा सकें लेकिन पिछले काफी दिनों से यह टोल फ्री नंबर 18001804171भी खराब है। इस कारण भी अभिभावकों को कोई संतोषजनक जवाब नहीं मिल रहा है। बोर्ड प्रशासन इस तरफ भी कोई ध्यान नहीं दे रहा ताकि नंबर को ठीक करवाया जा सके।

जल्द करवा दिया जाएगा समस्या का समाधान : सचिव

इस बारे में हरियाणा विद्यालय शिक्षा बोर्ड सचिव डा. अनशज सिंह से बात की गई तो उन्होंने कहा कि अभी तक तो यह दिक्कत नहीं आई है लेकिन फिर भी कोई परेशानी है तो वह इस बारे में तकनीकी लोगों को समस्या का समाधान करने के निर्देश देंगे और जल्द ही समस्या का समाधान करा दिया जाएगा

खुद को पर्यावरण के लिए महिला वकील ने कर दिया समर्पित

अब तक लगवा चुकी 177 त्रिवेणी जींद। महिला एडवोकेट संतोष यादव ने खुद को पर्यावरण की हिफाजत के लिए समर्पित कर दिया है। वह जींद समेत अब तक...