Monday, 7 April 2014

स्टाफ ना अधिकारी कैसे बुझेगी आग

दमकल विभाग के पास कर्मचारियों का भारी टोटा

 जींद में दमकल विभाग के पास महज एक शिफ्ट का स्टाफ
 कर्मचारियों के अभाव में खड़ी हैं दमकल विभाग की गाडिय़ां


जींद। गेहूं की कटाई का सीजन शुरू होने के कारण आगजनी की घटनाएं बढऩे का अंदेशा भी बना रहता है। ऐसे में आगजनी की घटनाओं से निपटने की पूरी जिम्मेदारी दमकल विभाग के कंधों पर होती है लेकिन स्टाफ की कमी के कारण जींद के दमकल विभाग का दम निकल चुका है। दमकल विभाग के पास गाडिय़ां तो हैं लेकिन स्टाफ नहीं है। ऐसे में सवाल यह खड़ा हो रहा है कि बिना कर्मचारियों के आखिरी दमकल विभाग आगजनी की घटनाओं से कैसे निपटेगा। यही नहीं जींद में तो दमकल विभाग के पास गाडिय़ों में पानी भरने के लिए हाईडैंट या टैंक की भी कोई व्यवस्था नहीं है। यही कारण है कि आगजनी की घटना घटने के बाद घटना स्थल पर पहुंचने में दमकल विभाग की गाडिय़ों को अकसर देरी हो जाती है। क्योंकि गाडिय़ों में पानी भरने की प्रक्रिया में दमकल विभाग के कर्मचारियों का काफी समय खराब हो जाता है। इतना ही नहीं जींद जिले में पूरे दमकल विभाग के पास एक भी फायर स्टेशन अधिकारी नहीं है। सभी स्टेशनों पर फायर स्टेशन अधिकारी का पद खाली है।

गाडिय़ां चार स्टाफ एक का भी पूरा नहीं 

जींद दमकल विभाग के पास आगजनी से निपटने के लिए चार गाडिय़ां हैं लेकिन स्टाफ एक गाड़ी का भी पूरा नहीं है। इस समय यहां पर एक एएफएसओ तथा 15  कर्मचारियों का स्टाफ है। इसमें 5 चालक तथा 10 फायरमैन हैं। एक गाड़ी के साथ एक चालक, एक लीडिंग फायरमैन तथा चार फायरमैन की ड्यूटी होती है। इस तरह यहां पर 24 कर्मचारियों के स्टाफ की जरूरत है। स्टाफ की कमी के चलते यहां पर ड्यूटीरत कर्मचारियों को 12 -12 घंटे ड्यूटी देनी पड़ती है। इस बीच यदि किसी कर्मचारी को कोई एमरजैंसी हो जाती है तो यहां तैनात कर्मचारियों को 24 घंटे भी ड्यूटी करनी पड़ती है। यहां पर कर्मचारियों की कमी के बावजूद भी नगर परिषद द्वारा दमकल विभाग के 5 कर्मचारियों को यहां से हटाकर नगर परिषद का काम लिया जा रहा है। इस प्रकार बिना स्टाफ के आखिरी आगजनी की घटनाओं से कैसे निपटा जा सकता है।

स्माल फायर वाटर इंजन की भी नहीं व्यवस्था

जींद दमकल विभाग के पास इस वक्त चार बड़ी गाडिय़ां हैं लेकिन स्माल फायर वाटर इंजन नहीं है। शहर के बाजार की गलियां काफी तंग हैं और बाजार में अकसर भीड़-भड़ाका रहता है। ऐसे में आगजनी की घटना घटने के बाद बड़ी गाडिय़ां बाजार में नहीं जा पाती। बाजार में आगजनी की घटना से निटपने के लिए दमकल विभाग को स्माल फायर वाटर इंजन की जरूरत है लेकिन पिछले काफी लंबे समय से दमकल विभाग के पास यह व्यवस्था नहीं है।

बिना पानी के कैसे बुझेगी आग

फायर ब्रिगेड के पास गाडिय़ों में पानी भरने के लिए हाईडैंट या टैंक की कोई व्यवस्था नहीं है। इस कारण आगजनी की घटना के वक्त गाडिय़ों में पम्प इत्यादि से पानी भरने में दमकल विभाग के कर्मचारियों का काफी समय बर्बाद हो जाता है। दमकल विभाग के पास पानी के स्टॉक के लिए कोई टैंक नहीं होने के कारण दमकल विभाग की गाडिय़ां पानी के लिए ज्यादातर लाइट पर निर्भर रहती हैं। ऐसे में अगर आगजनी की घटना के समय शहर में लाइट व्यवस्था जवाब दे जाती है तो दमकल विभाग के कर्मचारियों के पास लाइट का इंतजार करने के अलावा कोई चारा नहीं है।

नगर परिषद के दमकल विभाग की सबसे बुरी हालत

जींद जिले में दमकल विभाग दो भागों में बंटा हुआ है। जींद तथा नरवाना में मार्केट कमेटी तथा नगर परिषद दोनों के दमकल विभाग के अलग-अलग कार्यालय हैं। इसके अलावा जुलाना, उचाना तथा सफीदों में दमकल विभाग मार्केट कमेटी के अधीन है। जींद तथा नरवाना में नगर परिषद के अधीन आने वाले दमकल विभाग का सबसे बुरा हाल है। जींद के दमकल विभाग के पास कर्मचारियों का टोटा है तो नरवाना के दमकल विभाग के पास गाड़ी का अभाव है। नरवाना के दमकल विभाग के पास दो गाडिय़ां हैं। इनमें से एक गाड़ी चालू हालत में है तो दूसरी गाड़ी कल-पुर्जों के अभाव में खस्ता हालत में खड़ी है।

कच्चे कर्मचारियों के कंधों पर है सफीदों का भार

सफीदों में आगजनी की घटनाओं से निपटने की पूरी जिम्मेदारी कच्चे कर्मचारियों के कंधों पर है। सफीदों में दमकल विभाग के पास कुल 15 कर्मचारियों का स्टाफ है। इनमें 9 फायरमैन, 3 लीडिंग फायरमैन तथा 3 चालक हैं। यह सभी कर्मचारी कच्चे कर्मचारी हैं। सफीदों में दमकल विभाग के पास एक भी पक्का कर्मचारी नहीं है। यहां तो स्थित यह है कि पिछले कई वर्षों से फायर स्टेशन अधिकारी (एफएसओ) ही नहीं है।

उचाना में नहीं एक भी गाड़ी

उचाना में दमकल विभाग के पास एक भी गाड़ी नहीं है। ऐसे में यदि उचाना या अलेवा में आगजनी की कोई घटना घटती है तो उससे निपटने के लिए जींद या नरवाना से गाड़ी बुलानी पड़ेगी। वहीं उचाना में स्टाफ की भी कमी है। इस वक्त उचाना में सिर्फ चार कर्मचारियों का ही स्टाफ है।
बॉक्स
स्थान का नाम गाडिय़ों की संख्या गाडिय़ों की जरुरत
जींद     4  2
नरवाना     2   0
उचाना कोई गाड़ी  नहीं 2
जुलाना     1  1
सफीदों     1  1
 दमकल विभाग के कार्यालय में खड़ी गाडिय़ां।


कर्मचारियों की कमी को देखते हुए लगभग 2 -3  माह पहले डीसी रेट पर नए कर्मचारियों की नियुक्ति के लिए प्रोजल तैयार कर जिला प्रशासन को भेजा गया था लेकिन अभी तक डीसी रेट पर नए कर्मचारियों की नियुक्ति नहीं हो पाई है। जैसे ही प्रशासन की तरफ से डीसी रेट पर नए कर्मचारियों की नियुक्ति के निर्देश मिलेंगे उसके तुरंत बाद नए कर्मचारियों की नियुक्ति की जाएगी।
जगदीशचंद
एएफएसओ, जींद  

जहरीले पानी से मुक्ति दिलवाने की तैयारी

नहरी पानी मुहैया करवाने के लिए जन स्वास्थ्य विभाग ने तैयार किया प्रारुप

पानी में बढ़ते फ्लोराइड व टीडीएस के कारण लिया फैसला 


जींद। अंधाधुंध भूजल दोहन के कारण जहरीले हो रहे पेयजल से शहर के लोगों को मुक्ति दिलवाने के लिए जन स्वास्थ्य विभाग ने कवायद शुरू कर दी है। इसके लिए जन स्वास्थ्य विभाग द्वारा शहर के लोगों को नहरी पानी सप्लाई की योजना तैयार की जा रही है। शहर के लोगों को नहरी पानी मुहैया करवाने के लिए जन स्वास्थ्य विभाग द्वारा शहर के बीचोंबीच से गुजर रही हांसी ब्रांच नहर के पास 106 एकड़ में बूस्टिंग स्टेशन तैयार किया जाएगा। योजना को अमल में लाने के लिए जन स्वास्थ्य विभाग द्वारा इसका प्रारूप तैयार किया जा रहा है। प्रारूप तैयार होते ही इसकी मंजूरी के लिए विभाग के उच्च अधिकारियों को भेजा जाएगा। उच्चाधिकारियों से मंजूरी मिलते ही योजना पर अमल शुरू कर दिया जाएगा। शहर में नहरी पानी की सप्लाई शुरू होने पर शहर के लोगों को पानी में बढ़ रहे फ्लोराइड तथा टीडीएस से निजात मिल जाएगी। 
इस समय शहर की आधी से अधिक आबादी को पेयजल मुहैया करवाने का जिम्मा जन स्वास्थ्य विभाग के कंधों पर है। खुलेआम हो रही जल की बर्बादी तथा दिन-प्रतिदिन बढ़ती पानी की मांग के कारण हो रहे भूजल के दोहन के कारण भूमिगत पानी लगातार जहरीला हो रहा है। पानी में फ्लोराइड तथा टीडीएस की मात्रा बढऩे के कारण भूमिगत जल पीने लायक नहीं बचा है। इसी कारण लोगों में हड्डियों तथा जोड़ों की बीमारियां बढऩे के मामले भी लगातार सामने आने लगे हैं। पानी में बढ़ती फ्लोराइड तथा टीडीएस की मात्रा के कारण भविष्य में पेयजल से होने वाले खतरे को भांपते हुए अब जन स्वास्थ्य विभाग शहर के लोगों को इस जहरीले पानी से निजात दिलाने की कवायद में जुट गया है।  जन स्वास्थ्य विभाग अब शहर में नहरी पानी की सप्लाई की योजना तैयार कर रहा है। इसके लिए विभाग द्वारा शहर के बीचों-बीच से गुजर रही हांसी ब्रांच नहर के पास 106 एकड़ में बूस्टिंग स्टेशन तैयार किया जाएगा। बूस्टिंग स्टेशन से अंडर ग्राऊंड पाइप लाइन के माध्यम से शहर में पानी की सप्लाई की जाएगी। इसके लिए विभाग द्वारा प्रारूप तैयार किया जा रहा है। प्रारूप तैयार होते ही योजना को अमल में लाने के लिए विभाग ग्रांट की मंजूरी के लिए इसे उच्चाधिकारियों के पास भेजेगा। उच्चाधिकारियों से मंजूरी मिलते ही योजना पर अमल शुरू किया जाएगा। 

47 ट्यूब्वैल और 13 हजार कनैक्शन

जन स्वास्थ्य विभाग द्वारा शहर में पेयजल की सप्लाई के लिए 47 ट्यूब्वैल लगाए गए हैं। इस समय जन स्वास्थ्य विभाग के पास शहर में कुल 13 हजार कनैैक्शन हैं। इन 47 ट्यूब्वैल के सहारे शहर के दो लाख से अधिक लोगों को पानी की सप्लाई किया जा रहा है। खुलेआम पानी की बर्बादी तथा पानी की अधिक मांग के कारण भूमिगत पानी का अंधाधुंध दोहन हो रहा है। इससे जमीनी पानी में फ्लोराइड तथा टीडीएस की मात्रा बढ़ रही है और पानी पीने लायक नहीं बचा है।  

पेयजल में बढ़ते फ्लोराइड और टीडीएस से मिलेगी निजात

जमीनी पानी में फ्लोराइड तथा टीडीएस की मात्रा लगातार बढ़ रही है। इससे जमीनी पानी पीने योग्य नहीं बचा है। इसको देखते हुए जन स्वास्थ्य विभाग द्वारा शहर में नहरी पानी की सप्लाई शुरू करने की योजना बनाई जा रही है। योजना के सिरे चढऩे के बाद शहर के लोगों को फ्लोराइड तथा टीडीएस से निजात मिलेगी। 

यह है पानी में फ्लोराइड व टीडीएस की मात्रा 

पानी में फ्लोराइड की मात्रा एक मिलीग्राम प्रति लीटर होनी चाहिए। जबकि शहर में इसकी मात्रा चार से पांच मिलीग्राम प्रति लीटर है। शहर में पानी का टीडीएस भी ज्यादा है। 200 टीडीएस तक का पानी पीने लायक होता है। इससे अधिक टीडीएस के पानी से बीमारियां होने का खतरा बन जाता है। जबकि शहर के पानी में टीडीएस की मात्रा 500 से 800 से तक है जो स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। 
जन स्वास्थ्य विभाग के कार्यालय का फोटो।

बढ़ जाते हैं पेट व हड्डियों के रोग

सामान्य रोग विशेषज्ञ डॉ. राजेश भोला का कहना है कि पानी में फ्लोराइड तथा टीडीएस (टोटल डिजोलड सालट) की मात्रा बढऩे से पेट के रोग बढ़ जाते हैं। इससे पत्थरी तथा पेट में इंफेक्शन होने की संभावना बढ़ जाती हैं। यदि पानी में फ्लोराइड ज्यादा मात्रा में होता है तो इससे हड्डियों व दांतों के रोग भी हो जाते हैं। हड्डियां कमजोर होने के कारण जोड़ों के दर्द हो जाते हैं और दांत कमजोर तथा पीले पडऩे लगते हैं। पीने लायक पानी में टीडीएस की मात्रा 80 से 100 के बीच होती है। 

गोहाना बाइपास की तरफ की कालोनियों के हालात सबसे खतरनाक 

शहर के गोहाना बाइपास की तरफ की कालोनियों के हालात सबसे खतरनाक हैं। इस क्षेत्र में पानी में टीडीएस की मात्रा दो से ढाई हजार टीडीएस तक पहुंच चुकी है। जबकि 200 टीडीएस तक का पानी पीने लायक होता है। इससे यहां पर बीमारियों के ज्यादा फैलने का खतरा बन रहा है। 

पानी में फ्लोराइड तथा टीडीएस की मात्रा लगातार बढ़ रही है। इससे लोगों के स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पड़ता है। लोगों को इससे निजात दिलवाने के लिए विभाग द्वारा शहर में नहरी पानी की सप्लाई का प्रारूप तैयार किया जा रहा है। प्रारूप तैयार होते ही इसकी मंजूरी के लिए विभाग के उच्चाधिकारियों के पास भेजा जाएगा। प्रारूप के अनुसार हांसी ब्रांच नहर के पास ही 106 एकड़ में बूस्टिंग स्टेशन तैयार करने की योजना है। 
दलबीर सिंह दलाल
एक्सईएन, जन स्वास्थ्य विभाग, जींद

हांसी ब्रांच नहर का फोटो, जिसके पास बूस्टिंग स्टेशन का निर्माण किया जाना है।

Tuesday, 25 March 2014

छोटी सी उम्र में निकल पड़ा बेटी बचाने

अब अंधेरी जिंदगियों को रोशन करने के लिए छेड़ दी मुहिम 


जींद। जिस उम्र में बच्चों को मौज-मस्ती के सिवाये कुछ नहीं सुझता, उस उम्र में उसने सामाजिक कुरीतियों को खत्म करने के सपने बुन लिए और उन सपनों को हकीकत में बदलने के लिए महज १५ साल की उम्र में ही संघर्ष शुरू कर दिया। खेल गांव निडानी निवासी अमित के सिर पर छोटी सी उम्र में ही समाज सेवा का ऐसा भूत सवार हुआ कि फिर उसने पीछे मुड़कर नहीं देखा। अमित ने उम्र के 24वें पड़ाव तक पहुंचते-पहुंचते शराब बंदी तथा कन्या भ्रूण हत्या जैसी सामाजिक कुरीतियों को खत्म करने के अभियानों को शिखर तक पहुंचाने के बाद अब अंधेरी जिंदगियों को रोशन करने के लिए नेत्रदान के लिए अभियान की शुरूआत की है। अमित निडानी ने वंदे मातरम प्रतिष्ठान के माध्यम से 24 फरवरी 2014  को गांव में एक बड़े कार्यक्रम का आयोजन कर दो हजार से ज्यादा पुरुषों और महिलाओं को नेत्रदान के लिए प्रेरित किया।  
जिला मुख्यालय से 14 किलोमीटर की दूरी पर स्थित खेल गांव निडानी निवासी अमित ने समाज सेवा की अपनी इच्छा को पूरा करने के लिए सबसे पहले अपने संघर्ष की शुरूआत अपने गांव से ही की। गांव को शराब मुक्त बनाने के लिए अमित ने गांव के युवाओं को एकत्रित कर युवा संगठन का गठन किया और ग्रामीणों के सहयोग से गांव में चल रहे शराब के अवैध खुर्दों को बंद करवाकर गांव में जड़ें जमा रहे शराब माफियाओं को उखाड़ कर गांव से बाहर कर दिया। इसके बाद अमित का टारगेट था नन्ही बेटियों को बचाने का। कन्या भ्रूण हत्या के कारण गिरते लिंगानुपात को देखते हुए अमित निडानी ने गर्भ में मारी जा रही बेटियों को बचाने के लिए वर्ष 2008 में बेटी बचाओ सृष्टि बचाओ अभियान की नींव रखी। अमित ने गांव में जागरूकता अभियान शुरू कर गांव के लोगों को कन्या भ्रूण हत्या को रोकने के लिए जागरूक किया। अमित ने समाज में बेटी के महत्व को देखते हुए बेटे के जन्म पर निभाई जाने वाली कुआ पुजन की परंपरा को बेटी के जन्म पर शुरू करवाया। धीरे-धीरे यह अभियान एक गांव से दूसरे गांव से चलकर जिला स्तर और फिर राज्य स्तर तक जा पहुंचा। प्रदेशभर के लोगों को इस मुहिम से जोडऩे के लिए अमित ने 12 दिसम्बर 2012 को राज्य स्तरीय जागरूकता रथ यात्रा की शुरूआत की। भारत सरकार के ग्रह सचिव उदयचंद्र अग्रवाल ने इस रथ यात्रा को हरी झंडी दिखाकर रवाना किया। कन्या भ्रूण हत्या को रोकने के लिए यह रथ यात्रा पूरे प्रदेश में घूमी। एक जननवरी 2013 में नव वर्ष के अवसर पर अमित निडानी ने कन्या भ्रूण हत्या के कारण गर्भ में मारी गई अजन्मी कन्याओं की आत्मा की शांति के लिए जिला स्तर पर एक हवन का आयोजन किया और शहर के गणमान्य लोगों ने हवन में आहुति देकर गर्भ में मारी गई अजन्मी कन्याओं की आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना की। इस दौरान लोगों ने हवन में आहुति देकर कन्या भ्रूण हत्या नहीं करने का संकल्प लिया। अमित निडानी ने भ्रूण हत्या करने वालों पर शिकंजा कसने के लिए बड़े ईनाम की घोषणा की। अमित ने भ्रूण हत्या करने की सूचना देने वाले को सवा लाख रुपये का ईनाम देने की घोषणा की। इसी बीच शहर में महिलाओं के साथ बढ़ रही चेन स्नेचिंग की घटनाओं तथा चोरी की घटनाओं को रोकने के लिए अमित ने अपने खर्च पर शहर में कई स्थानों पर खुफिाया कैमरे लगवाए। इसके बाद निडानी ने गौहत्या को बंद करवाने के लिए अगस्त 2013 में गौहत्या को बंद करवाने के लिए आवाज उठाते हुए राज्य स्तरीय युवा कार्यक्रम का आयोजन किया। इस प्रकार अमित निडानी ने एक के बाद एक कर सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ आवाज बुलंद की। 

अब अंधेरी जिंदगियों को रोशन करने के लिए छेड़ दी मुहिम

 हरी झंडी दिखाकर जागरूकता रैली को रवाना करते अमित निडानी।
अमित निडानी ने शराब बंदी, कन्या भ्रूण हत्या तथा गौ हत्या जैसी सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ आवाज बुलंद करने के बाद अब अंधेरी जिंदगियों को रोशन करने के लिए मुहिम शुरू कर दी। वंदे मातरम प्रतिष्ठान एनजीओ का गठन कर 24 फरवरी 2014 को गांव में विशाल नेत्रदान महोत्सव का आयोजन किया। इस महोत्सव में निडानी ने दो हजार से ज्यादा पुरुषों तथा महिलाओं को नेत्रदान का संकल्प करवाया। इस प्रकार अब अमित निडानी ने कन्या भ्रूण हत्या के अभियान के बाद अंधेरी जिंदगियों को रोशन करने की मुहिम शुरू कर दी है। अमित का अगला लक्ष्य नेत्रदान के कानून में बदलाव करवाकर प्रत्येक व्यक्ति से नेत्रदान करवाना है। 

पिता से मिली प्रेरणा

अमित निडानी के पिता सरकारी स्कूल में कला अध्यापक हैं। निडानी ने बताया कि उसे सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ मुहिम शुरू करने की प्रेरणा अपने पिता मास्टर समुंद्र सिंह से मिली है। निडानी ने कहा कि उनके पिता ने न केवल उसका मार्ग दर्शन किया बल्कि उसकी मुहिम को आगे बढ़ाने के लिए हर संभव मदद भी की। 

सरकार ने दिया जिला स्तरीय सर्वश्रेष्ठ युवा अवार्ड 

अमित निडानी द्वारा सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ जिले में शुरू की गई मुहिम को देखते हुए सरकार की तरफ से अमित को 2013 का सर्वश्रेष्ठ युवा का जिला स्तरीय अवार्ड देकर सम्मानित किया गया। 

कन्या भ्रूण हत्या के खिलाफ लोगों को जागरूक करने के लिए शहर में जागरूकता रैली निकालते अमित निडानी का फाइल फोटो।


बेटी के जन्म पर खाप प्रतिनिधियों से रिबन कटवाकर कुआ पुजन की परम्परा शुरू करते अमित निडानी का फाइल फोटो।

अजन्मी कन्याओं की आत्मा की शांति के लिए नव वर्ष पर हवन में आहुति डलवाते अमित निडानी का फाइल फोटो।  

बेटी के जन्म पर कुआ पुजन के दौरान ढोल-नगाड़ों के साथ खुशी मनाते लोगों का फाइल फोटो।  

तैयारी 200 बैड की,सुविधाएं 100 बैड की भी नहीं

मरीजों की मर्ज बढ़ा रही सामान्य अस्पताल की स्वास्थ्य सेवाएं

बिना चिकित्सकों के कैसा मुफ्त इलाज


जींद। प्रदेश सरकार की सामान्य अस्पतालों में मरीजों को मुफ्त इलाज की योजना को लागू हुए तीन माह का समय बीत चुका है, लेकिन जींद शहर के सामान्य अस्पताल की स्वास्थ्य सेवाएं मरीजों का दर्द कम करने की बजाए उनकी मर्ज बनती जा रही हैं। स्वास्थ्य विभाग द्वारा 100  बैड के इस अस्पताल को अपग्रेड कर 200 बैड का किया जा रहा है लेकिन सामान्य अस्पताल में सुविधाएं 100 बैड की भी नहीं हैं। सामान्य अस्पताल में चिकित्सकों की कमी के चलते हुए यहां आने वाले मरीजों को सरकार की मुफ्त इलाज योजना का लाभ नहीं मिल पा रहा है। छोटी सी बीमारी के उपचार के लिए भी मरीजों को यहां घंटों इंतजार करना पड़ता है। सामान्य अस्पताल प्रशासन की लापरवाही का आलम यह है कि कई-कई घंटों तक इंतजार करने के बाद भी उन्हें कोई यह बताने वाला नहीं है कि जिस डॉक्टर से उन्हें इलाज करवाना है आज वह ड्यूटी पर है या छुट्टी पर है। सामान्य अस्पताल प्रशासन की लापरवाही के चलते मरीजों को मजबूरीवश निजी अस्पतालों का रुख करना पड़ रहा है। ऐसे में आखिर सवाल यह उठता है कि चिकित्सकों के बिना सरकार की मुफ्त योजना कैसे सफल हो पाएगी।

 20 पद खाली

सामान्य अस्पताल में चिकित्सकों की कुल 50 पद सैंक्शन हैं। इनमें से 20 पद खाली पड़ी हैं और 20 पदों भरी हुई हैं। इनमें से कई महीनों से एक डॉक्टर अनुपस्थित चल रहा तो दो डॉक्टर पिछले कई माह से लंबी छुट्टी पर हैं और एक डॉक्टर को छह माह की ट्रेनिंग पर भेजा गया है। इस प्रकार 100 बैड के इस अस्पताल की जिम्मेदारी महज 26 डॉक्टरों के सहारे चल रही है। इनमें से भी हर रोज कुछ डॉक्टरों को कोर्ट इत्यादि में गवाही के लिए जाना पड़ता है।

सर्जन सहित रेडियोलाजिस्ट और त्वचा रोग विशेष की भी कमी

जिला मुख्यालय पर स्थित सामान्य अस्पताल में चिकित्सकों की कमी का आलम यह है कि 100 बैड के इस अस्पताल में सिर्फ एक सर्जन है और वह भी पिछले लगभग 20 दिनों से छुट्टी पर चल रहे हैं। सर्जन के छुट्टी पर चले जाने के कारण इस समय सामान्य अस्पताल में आप्रेशन बंद पड़े हैं। ऑप्रेशन के लिए आने वाले मरीजों को निजी अस्पतालों का रुख करना पड़ रहा है। सर्जन के अलावा सामान्य अस्पताल में रेडियोलाजिस्ट तथा त्वचा रोग विशेषज्ञ की भी कमी है। यहां पर न तो रेडियोलाजिस्ट है और न ही त्वचा रोग विशेषज्ञ। सामान्य अस्पताल में ऑर्थो का भी केवल एक चिकित्सक है और वह भी अब ३१ मार्च को सेवानिवृत्त होने जा रहा है।

कैंटिन की भी नहीं है सुविधा

सामान्य अस्पताल में मरीजों के लिए कैंटिन तक की सुविधा नहीं है। अस्पताल परिसर में कैंटिन नहीं होने के कारण मरीजों को खाली पेट ही घंटों तक बैठकर डॉक्टरों का इंतजार करना पड़ता है।

 10 दिन से काट रहा हूं अस्पताल के चक्कर

सामान्य अस्पताल में उपचार के लिए आए गांव लोहचब निवासी सतबीर ने बताया कि उसकी हड्डी में फ्रेक्चर है और वह हड्डी के उपचार के लिए पिछले 10 दिन से सामान्य अस्पताल के चक्कर काट रहा है लेकिन हर बार उसे चिकित्सक नहीं मिलने के कारण वापिस लौटना पड़ता है। सतबीर ने बताया कि जब वह एक्सरे के लिए एक्सरे विभाग में गया तो उसे बताया गया कि लाइट नहीं है इसलिए एक्सरे नहीं होगा।
ईगराह निवासी सतबीर का फोटो। 



मेडिकल के लिए भी घंटों करना पड़ता है इंतजार

सामान्य अस्पताल में आए पति-पत्नी नरसी तथा पूजा ने बताया कि उन्हें अपना मेडिकल करवाना है और वह कई देर से यहां बैठे हैं लेकिन ड्यूटी पर मौजूद चिकित्सक उनकी सुध नहीं ले रहा है। जब भी वह चिकित्सक से मेडिकल करने के लिए कहते हैं तो चिकित्सक उन्हें बाहर इंतजार करने के लिए कह देते हैं। घंटों इंतजार के बाद भी उनका मेडिकल नहीं हुआ है।
 नरसी का फोटो।

छह घंटे के इंतजार के बाद भी नहीं हुआ बच्चों का इलाज

ईगराह गांव निवासी कमलेश ने बताया कि वह अपने बच्चों के चैकअप के लिए सामान्य अस्पताल में आई थी लेकिन यहां पर चिकित्सक ही नहीं है। कमलेश ने बताया कि वह सुबह साढ़े दस बजे अस्पताल में आई थी और तीन बजे तक इंतजार करने के बाद भी वहां कोई डॉक्टर नहीं पहुंचा। इसलिए कई घंटे के इंतजार के बाद भी बिना बच्चों का उपचार करवाए ही उसे घर लौटना पड़ेगा।
 बच्चों के उपचार के लिए सामान्य अस्पताल में चिकत्सकों का इंतजार करती ईगराह निवासी कमलेश। 




 जींद के सामान्य अस्पताल का फोटो। 

बाल स्वास्थ्य योजना पर प्रशासन की लापरवाही का दंश

तीन माह बाद भी नहीं शुरू हो पाया डीईआईसी की भवन का निर्माण

कैबिनों में होगा बच्चों का इलाज
अस्पताल के निरीक्षण के लिए 27 को जींद पहुंचेगी एनआरएचएम की टीम
लिपापोती में जुटा अस्पताल प्रशासन 


जींद। स्वास्थ्य विभाग द्वारा राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य योजना के तहत आंगनवाड़ी तथा सरकारी स्कूलों में पढऩे वाले 0 से 18 वर्ष तक के बच्चों के मुफ्त इलाज की योजना पर सामान्य अस्पताल प्रशासन की लापरवाही का दंश लग चुका है। विभाग की योजना के तहत 0 से 18 वर्ष के बच्चों को मुफ्त उपचार देने के लिए सामान्य अस्पताल में स्थापित होने वाले डिस्ट्रिक अर्ली इंटरमेंशन सेंटर (डीईआईसी) की बिल्डिंग का निर्माण तीन माह बीत जाने के बाद भी शुरू नहीं हो पाया है। 27 मार्च को अस्पताल के निरीक्षण के लिए एनएचआरएम की टीम जींद पहुंच रही है। एनएचआरएम की टीम के जींद पहुंचने की सूचना मिलने पर अस्पताल प्रशासन में हड़कंप मचा हुआ है। टीम के सामने अस्पताल प्रशासन की पोल नहीं खुले इसलिए अस्पताल प्रशासन लिपापोती पर लगा हुआ है। अपनी गलती पर पर्दा डालने के लिए अस्पताल प्रशासन द्वारा बिल्डिंग का निर्माण करने की बजाये अस्पताल के अंदर कमरों में ही अलग से कैबिन तैयार करवाए जा रहे हैं।

यह है स्वास्थ्य विभाग की योजना

स्वास्थ्य विभाग द्वारा राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य योजना के तहत आंनवाड़ी तथा सरकारी स्कूलों में पढऩे वाले 0 से 18 वर्ष तक के बच्चों को मुफ्त इलाज किया जाना है। इस योजना के तहत विभाग ने ब्लड कैंसर, ह्रदय रोग, कैंसर सहित 30 प्रकार की ऐसी गंभीर बीमारियों को अपनी सूची में शामिल किया है, जिनके उपचार पर मोटी रकम खर्च होती है। इस योजना को सफल बनाने के लिए जिले में प्रत्येक ब्लॉक पर मोबाइल टीमों का गठन किया गया है। यह टीमें बच्चों में बीमारी के लक्षण नजर आते ही पीएचसी तथा सीएचसी स्तर पर उनके उपचार की व्यवस्था करेंगी। यदि यहां पर उपचार संभव नहीं हो पाता है तो बच्चे को जींद के सामान्य अस्पताल में रैफर किया जाएगा। यदि बीमारी गंभीर है तो बच्चे को उपचार के लिए पीजीआई भेजा जाएगा। बच्चे की पर्ची बनवाने से लेकर बच्चे के उपचार तक की पूरी जिम्मेदारी इस टीम में शामिल सदस्यों की होगी।

बिल्डिंग के निर्माण पर खर्च होने थी 10  लाख की राशि 

राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य योजना के तहत जींद के सामान्य अस्पताल में डीईआईसी सेंटर स्थापित किया जाना था। इस सेंटर में बच्चों के पर्ची बनाने से लेकर उपचार तक की सभी सुविधाएं मुहैया करवाई जानी थी। जिला स्तर पर निॢमत सैंटर पर 15 सदस्यों के स्टाफ की नियुक्ति की जानी है। इसमें डॉटा आप्रेटर, स्टाफ नर्स, लैब टैक्नीशियन, सोशल वर्कर से लेकर विशेषज्ञ तक की नियुक्ति की जानी थी। सेंटर की बिल्डिंग के निर्माण पर 10 लाख रुपए तथा डैकोरेशन पर लगभग दो लाख रुपए की राशि खर्च की जानी थी।

लीपापोती में जुटा अस्पताल प्रशासन 

सामान्य अस्पताल में 10 लाख की राशि से तैयार होने वाली डीईआईसी की बिल्डिंग के निर्माण के लिए लगभग तीन माह पहले विभाग द्वारा सामान्य अस्पताल प्रशासन को निर्देश जारी किए गए थे लेकिन अस्पताल प्रशासन द्वारा विभाग के निर्देशों पर कोई अमल नहीं किया गया। अब 27 मार्च को सेंटर के निरीक्षण के लिए एनआरएचएम की टीम अस्पताल का दौरा करेगी। टीम के दौरे की सूचना के बाद से अस्पताल प्रशासन में हड़कंप मचा हुआ है। निरीक्षण के दौरान अपनी गलतियों पर पर्दा डालने के लिए अस्पताल प्रशासन लीपापोती में जुटा हुआ है। बिल्डिंग का निर्माण शुरू करवाने की बजाए अब अस्पताल प्रशासन ने अस्पताल के अंदर कमरों में ही इस सेंटर के लिए कैबिन बनाने शुरू कर दिए हैं। बिल्डिंग की बजाए अब अस्पताल प्रशासन द्वारा कैबिनों में बच्चों का इलाज किया जाएगा।

सिविल सर्जन डॉ. दीपा जाखड़ से सीधे सवाल 

सवाल : तीन माह पहले विभाग द्वारा निर्देश जारी किए जाने के बाद भी बिल्डिंग का निर्माण शुरू क्यों नहीं हो पाया?
जवाब : यहां पर उनकी नियुक्ति अभी हुई है। उनके पास समय कम था और बिल्डिंग के निर्माण की प्रक्रिया लंबी थी, इसलिए उन्होंने फिलहाल डॉक्टरों के बैठने के लिए कैबिनों का निर्माण करवाया है।
सवाल : क्या बिल्डिंग की राशि से कैबिन तैयार करवाए जा रहे हैं?
जवाब : नहीं यह खर्च बिल्डिंग की राशि से अलग है।
सवाल : बिल्डिंग का निर्माण कब शुरू करवाया जाएगा?
जवाब : बिल्डिंग के निर्माण के लिए सम्बंधित विभाग के पास पत्र भेजा गया है। जल्द ही निर्माण शुरू करवा दिया जाएगा।
अस्पताल में डीईआईसी के लिए कमरों के अंदर ही तैयार करवाए जा रहे कैबिन।

सामान्य अस्पताल में डीईआईसी की टीम के बैठने के लिए बनाए गए कैबिन।

सामान्य अस्पताल में वह जगह जहां पर डीईआईसी की बिल्डिंग का निर्माण किया जाना था। 

Wednesday, 12 March 2014

अल के प्रकोप से फसल को बचाने के लिए किसान समय पर दें पर्याप्त खुराक

अल की रोकथाम के लिए किसी भी तरह के कीटनाशकों का प्रयोग ना करें किसान

फसल में मौजूद कूदरती कीटनारियों की मदद से ही होगा अल पर कंट्रोल


जींद। पिछले कई दिनों से मौसम में हो रहे परिवर्तन के कारण गेहूं तथा सरसों की फसल में अल (चेपा) का प्रकोप बढऩे लगा है। गेहूं और सरसों की फसल मेंं बढ़ते अल के प्रकोप को देखकर किसानों के माथे पर चिंता की लकीरें खींचने लगी हैं। अल को कंट्रोल करने के लिए किसान फसल में महंगे-महंगे कीटनाशकों तथा रासायनिक उर्वरकों का प्रयोग कर रहे हैं। महंगे-महंगे कीटनाशकों के प्रयोग के बाद भी सरसों व गेहूं की फसल से अल का प्रकोप कम नहीं हो रहा है। वहीं कृषि विभाग ने किसानों की परेशानी को समझते हुए अल का तोड़ फसल में ही मौजूद मांसाहारी कीटों में ढूंढ़ निकाला है। कृषि विभाग के अधिकारियों द्वारा किसानों को अल को कंट्रोल करने के लिए फसलों में कीटनाशकों का प्रयोग करने की बजाये फसल में मौजूद मांसाहारी कीटों की पहचान करने तथा फसल को पर्याप्त खुराक देने की गाइड लाइन जारी की गई हैं।  

क्या है अल (चेपा)

एडीओ डॉ. कमल सैनी के अनुसार अल कोई बीमारी नहीं है। यह एक शाकाहारी कीट है, जो पौधों से रस चूसकर अपना जीवन यापन करता है। इस कीट का प्रकोप मुख्यत फरवरी से मार्च माह तक अधिक होता है। यह कीट हरे रंग की जूं की तरह होता है। अल शिशु तथा प्रौढ़ दोनों ही अवस्थाओं में पौधों की कोमल पत्तियों व गेहूं की बालियों से रस चूसता है। अल से प्रकोपित पौधे की पत्तियां मुराझा जाती हैं। यह कीट शर्करायुक्त चिपचिपा पदार्थ छोड़ता है। इससे चीटियां इन पौधों की तरफ आकॢषत होती हैं। इस कीट की साल में १२ से १४ पीढिय़ां पाई जाती हैं, जो समय-समय पर अलग-अलग फसलों में आती रहती हैं। इसलिए इस कीट की बीजमारी नहीं हो सकती।  

फसल में कब बढ़ता है अल का प्रकोप

फसल में नाइट्रोजन युक्त खाद का अधिक प्रयोग करने तथा आसमान में बादल छाए रहने के कारण फसल में अल की शुरूआत होती है। छिटपुट बारिश के कारण अल का प्रकोप ज्यादा बढ़ता है। इस समय बारिश का मौसम रहने के कारण गेहूं तथा सरसों की फसल में इसका प्रकोप ज्यादा बढ़ रहा है। 

किसान कैसे करें अल की रोकथाम

जिला कृषि उप-निदेशक डॉ. रामप्रताप सिहाग का कहना है कि जानकारी के अभाव में किसान आमतोर पर कीटों को नियंत्रित करने के लिए रासायनों का प्रयोग करते हैं लेकिन ज्यादातर देखने को मिलता है कि रासायनों के प्रयोग से भी कीट नियंत्रित नहीं हो पाते। डॉ. सिहाग ने बताया कि कीटों को नियंत्रित करने के लिए हमारी फसलों में मौजूद मांसाहारी कीट ही हमारे लिए कूदरती कीटनाशी का काम करते हैं। इस समय गेहूं तथा सरसों के पौधों पर अल के प्राकृतिक कीटनाशी या परभक्षी कीट देखेे जा सकते हैं। इनमें सिॢफड मक्खी, लेडी बर्ड बीटल के बच्चे, क्राइसोपा के बच्चे प्रमुख हैं जो अल को बड़े चाव के साथ खाकर इसे नियंत्रित करने का काम करते हैं। इसके साथ-साथ एक्डियस नामक कीट अल का परजीवी है जो कि अल के पेट में अपने अंडे देता है, जिससे अल का आकार बढ़ जाता है और एक्डियस नामक कीट को जन्म देता है। इस प्रकार फसल में मौजूद यह मांसाहारी कीट अपने आप ही अल को कंट्रोल कर देते हैं। अल को कंट्रोल करने के लिए किसी कीटनाशक की जरूरत नहीं है। बस जरूरत है तो किसानों को फसल में मौजूद मांसाहारी तथा शाकाहारी कीटों की पहचान करने तथा उनके क्रियाकलापों के बारे में जानकारी लेने की। 
मांसाहारी कीट क्राइसोपा का फोटो।

पौधों को समय पर दें पर्याप्त खुराक

कृषि विभाग के अधिकारियों का कहना है कि फसल को अल के प्रकोप से बचाने के लिए फसल को पर्याप्त रूप से खुराक देना भी बेहद जरूरी है। अल के प्रकोप के दौरान समय-सयम पर फसल मेें पोषक तत्वों का छिड़काव करें। इसमें प्रति एकड़ के लिए अढ़ाई किलो यूरिया, अढ़ाई किलो डीएपी तथा आधा किलो जिंक  29 प्रतिशत का 100 लीटर पानी में घोल तैयार कर फसल में इसका छिड़काव करें। एक-एक सप्ताह के अंतराल पर इसका छिड़काव किया जा सकता है। यह घोल अल से फसल को होने वाले नुकसान की पूर्ति कर फसल को दोगुणा फायदा पहुंचाता है। इसके प्रयोग से पैदावार में भी बढ़ौतरी होती है। 

फसल में कूदरती कीटनाशी का काम करने वाली लेड़ी बर्ड बीटल का फोटो।

गेहूं की फसल में मौजूद अल को चट करता मांसाहारी कीट का फोटो। 

Monday, 10 March 2014

किसान आयोग और कृषि अधिकारियों को कीट ज्ञान देंगे जींद के किसान

सात मार्च को जींद के किसान प्रशिक्षण केंद्र में होगा एक दिवसीय सैमीनार का आयोजन


जींद। कीट साक्षरता की मुहिम से जुड़े जींद जिले के किसान अब कृषि विभाग तथा हरियाणा किसान आयोग के अधिकारियों को कीट ज्ञान की मुहिम से रू-ब-रू करवाएंगे। इसके लिए सात मार्च को जींद के रोहतक रोड स्थित किसान प्रशिक्षण केंद्र (हमेटी) में एक दिवसीय सैमीनार का आयोजन किया जाएगा। इस सैमीनार में हरियाणा किसान आयोग के चेयरमैन डॉ. पड़ौदा, सचिव डा.. आर.एस. दलाल, कोर्डिनेटर डॉ. श्रीवास्तवा, नई दिल्ली स्थित एनसीआईटीएम के डायरेक्टर, सिरसा तथा नागपूर स्थित काटन रीजनल सैंटर के डायरेक्टर, हिसार एग्रीकल्यर यूनिवर्सिटी के प्रचार-प्रसार एवं अनुसंधान निदेशक डॉ. एस एस सिवाच सहित कई अन्य कृषि अधिकारी भाग लेंगे। इस कार्यक्रम में मौजूद अधिकारी कीट कमांडो किसानों के साथ कीटों पर गहन मंथन करेंगे। 
फसलों में कीटनाशकों के अंधाधुंध प्रयोग के कारण दूषित हो रहे खान-पान तथा वातावरण को जहरमुक्त बनाने के लिए जींद जिले के किसानों द्वारा वर्ष 2008 में कीट ज्ञान की मुहिम शुरू की गई थी। कीट ज्ञान की मुहिम से जुड़े इन किसानों द्वारा पिछले पांच-छह वर्षों में फसलों में मौजूद कीटों की पहचान करने के साथ-साथ कीटों के क्रियाकलापों पर काफी शोध किए गए हैं। इन किसानों द्वारा अब तक २०६ किस्म के मांसाहारी तथा शाकाहारी कीटों की पहचान की जा चुकी है। वर्ष 2008  से जींद जिले में चल रही कीट ज्ञान क्रांति की यह मुहिम अब रंग लाने लगी है। पंजाब के किसानों के बाद हाल ही में गन्नौर में आयोजित किसान सम्मेलन में कांग्रेस के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष राहुल गांधी को कीट ज्ञान का पाठ पढ़ाने के बाद अब जींद के यह कीट कमांडो किसान हरियाणा किसान आयोग तथा कृषि विभाग के अधिकारियों को कीट ज्ञान की इस मुहिम से रू-ब-रू करवाएंगे। इसके लिए कृषि विभाग द्वारा सात मार्च को जींद के किसान प्रशिक्षण केंद्र में एक दिवसीय सैमीनार का आयोजन किया गया है। इस सैमीनार की अध्यक्षता कृषि विभाग जींद के उप-निदेशक डॉ. रामप्रताप सिहाग करेंगे। सैमीनार में हरियाणा किसान आयोग के चेयरमैन डॉ. पड़ौदा, सचिव डा.. आर.एस. दलाल, कोर्डिनेटर डॉ. श्रीवास्तवा, नई दिल्ली स्थित एनसीआईटीएम के डायरेक्टर, सिरसा तथा नागपूर स्थित काटन रीजनल सैंटर के डायरेक्टर, हिसार एग्रीकल्यर यूनिवर्सिटी के प्रचार-प्रसार एवं अनुसंधान निदेशक डॉ. एस एस सिवाच सहित कई अन्य कृषि अधिकारी भाग लेंगे। इस सैमीनार के बाद किसान आयोग तथा कृषि विभाग द्वारा इस मुहिम को पूरे प्रदेश के किसानों तक पहुंचाने के लिए योजना तैयार की जाएगी। 

आठ घंटों तक कीटों पर होगा गहन मंथन

सात मार्च को जींद के किसान प्रशिक्षण केंद्र में आयोजित होने वाले एक दिवसीय सैमीनार में जींद के कीट कमांडों किसानों तथा किसान आयोग और कृषि विभाग के अधिकारियों के बीच कीटों पर गहन मंथन किया जाएगा। सैमीनार सुबह नौ से सायं चार बजे तक चलेगा। किसानों द्वारा सैमीनार में मौजूद अधिकारियों को कीट फसल में क्यों आते हैं और फसलों पर इनका क्या प्रभाव पड़ता है इसके बारे में अपने अनुभव बताए जाएंगे। 

खुद को पर्यावरण के लिए महिला वकील ने कर दिया समर्पित

अब तक लगवा चुकी 177 त्रिवेणी जींद। महिला एडवोकेट संतोष यादव ने खुद को पर्यावरण की हिफाजत के लिए समर्पित कर दिया है। वह जींद समेत अब तक...