Wednesday, 3 July 2013

कुदरत के साथ छेड़छाड़ रोकनी है तो कीट ज्ञान हासिल करें किसान : ढुल

किसान खेत पाठशाला के दूसरे सत्र में किसानों को फसल में नजर आए नए कीट


जींद। पृथ्वी पर जीवन यापन के लिए मौजूद सभी सुविधाएं कुदरत का इंसान को एक अनोखा तोहफा हैं लेकिन आज इंसान अपने स्वार्थ के वशीभूत होकर कुदरत के इस अनमोल तोहफे के साथ खिलवाड़ कर रहा है। इसलिए भविष्य में इंसान को इसके गंभीर परिणाम भुगतने के लिए भी तैयार रहना होगा। अगर किसानों को कुदरत का साथ देना है तो उन्हें कीट ज्ञान हासिल करना होगा। यह बात ढुल खाप के प्रधान इंद्र सिंह ढुल ने शनिवार को राजपुरा भैण गांव में आयोजित डा. सुरेंद्र दलाल कीट साक्षरता किसान खेत पाठशाला के दूसरे सत्र के दौरान किसानों को सम्बोधित करते हुए कही। इस अवसर पर उनके साथ चहल खाप के प्रतिनिधि दलीप सिंह चहल और डा. सुरेंद्र दलाल के पुत्र अक्षत भी मौजूद थे। पाठशाला की अध्यक्षता बराह तपा के प्रधान कुलदीप ढांडा ने की तथा संचालन कृषि विकास अधिकारी डा. कमल सैनी ने किया। पाठशाला में राजपुरा भैण, ईंटल कलां, ईंटल खुर्द, निडाना, निडानी, रधाना, ईगराह, रामराये, चाबरी, ललीतखेड़ा सहित दर्जनभर गांवों के किसानों ने कपास की फसल में मौजूद कीटों पर रिसर्च किया। पाठशाला के आरंभ में सभी किसानों ने कीट बही खाता तैयार करने के लिए कपास की फसल में मौजूद मांसाहारी तथा शाकाहारी कीटों का आंकड़ा दर्ज किया। 
पाठशाला के आरंभ में किसानों ने फसल में कीटों का अवलोकन कर कीट बही खाता तैयार किया। कीट बही खाते में सफेद मक्खी की औसत प्रति पत्ता 1.9, हरे तेले की 1.8 और चूरड़े की 2.5 थी। किसानों ने बताया कि कीट बही खाते के अनुसार फसल में मौजूद शाकाहारी कीट कृषि वैज्ञानिकों द्वारा तैयार की गई लक्ष्मण से कोसों दूर हैं। किसानों ने बताया कि शाकाहारी कीटों के साथ-साथ फसल में मांसाहारी कीट क्राइसोपा, क्राइसोपा के अंडे, फलहेरी बुगड़ा, बिंदुआ बुगड़ा, हंडेर बीटल तथा मकड़ी भी काफी संख्या में मौजूद हैं। उन्होंने बताया कि इस बार कपास की फसल में कुछ नए कीट सलेटी भूंड, सुरंगी कीड़ा, टीडा भी नजर आए हैं। किसानों ने बताया कि कपास के इस खेत में कुल 4355 पौधे हैं और प्रति पौधा एक मांसाहारी कीट क्राइसोपा भी मौजूद है। एक क्राइसोपा 40 मिनट में 30 हरे तेलों तथा बुगड़े ढेड मिनट में 1 कीड़े का काम तमाम कर देते हैं। उन्होंने बताया कि कपास की फसल में किए गए रिसर्च के दौरान वह 43 किस्म के शाकाहारी तथा 161 किस्म के मांसाहारी कीटों की पहचान कर चुके हैं। डा. कमल सैनी ने बताया कि पृथ्वी पर सबसे पहले पौधों की उत्पति हुई थी। इसके बाद धरती पर कीटों ने दस्तक दी थी। क्योंकि जीवों को जीवित रहने के लिए आक्सिजन की जरुरत होती है और आक्सिजन की उत्पति का केवल एक मात्र साधन हैंपौधे। बिना पौधों के धरती पर जीवन संभव नहीं है। पृथ्वी पर पौधों की लगभग 3 लाख किस्म की प्रजातियां हैं। इनमें से अढ़ाई हजार किस्म के पौधों को किसान फसलों के रूप में जानते हैं । 
 पाठशाला के आरंभ में कीट बही खाता तैयार करने के लिए फसल में कीटों का अवलोकन करते किसान। 
डा. सैनी ने कहा कि फिजिक्स का नियम कहता है कि पृथ्वी पर जो वस्तु पैदा हुई है, वह कभी भी खत्म नहीं होती।  वह तो बस समय-समय पर अपना आकार बदलती रहता है। पृथ्वी में ऐसे सुक्ष्म जीवाणु हैं जो मृत जीव या बेकार की वस्तु को दोबारा से तोडफ़ोड़कर उसकी वास्तविक स्थिति में बदल देते हैं। प्रकृति अपने नियमानुसार ही किसी जीव को पैदा और नष्ट करती है। इसलिए हमें प्रकृति के साथ ज्यादा छेड़छाड़ करने की जरुरत नहीं है।उन्होंने कहा कि किसान भय व भ्रम के जाल में फंसकर कीटों को मारने में लगे हुए हैं, जबकि सच्चाई यह है कि कीड़ों को मारने की जरुरत नहीं है। अगर जरुरत है तो कीड़ों को पहचानने और उनके क्रियाकलापों को समझने की। जो केवल कीट ज्ञान से संभव है। बिना कीट ज्ञान के किसान भय व भ्रम की स्थिति से बाहर नहीं निकल सकते। उन्होंने कहा कि एक ताजा रिपोर्ट के अनुसार अमेरीका ने तो प्रकृति के साथ बढ़ती छेड़छाड़ को रोकने के लिए पौधों के साथ किसी भी प्रकार की छेडख़ानी करने पर पूर्ण रूप से प्रतिबंध लगा दिया है। कीटाचार्य मनबीर रेढ़ू और रामदेवा ने बताया कि कीट इंसान से ज्यादा ताकतवर होते हैं। इसलिए वह अपने ऊपर आने वाली विपत्ति को पहले ही भांप लेते हैं और अपने वंश को बचाने के लिए अपना जीवन चक्र छोड़ा कर अपने अंड़े देने की क्षमता में वृद्धि कर लेते हैं। उन्होंने सफेद मक्खी का उदहारण देते हुए कहा कि सफेद मक्खी का जीवन काल 72 दिन का होता है और यह एक सप्ताह में 100 से 150 अंडे देती है लेकिन आपदा के समय सफेद मक्खी अपने जीवनकाल को छोटा कर 21 दिन का कर लेती है। 

 पाठशाला में किसानों को सम्बोधित करते कृषि अधिकारी तथा मौजूद किसान।

हरियाणा विद्यालय बोर्ड की लापरवाही

10वीं और 12वीं की रि-अपीयर के फार्म भरने वाले विद्यार्थी हुए परेशान
बोर्ड की वेबसाइट से रि-अपीयर का लिंक गायब


जींद। हरियाणा विद्यालय शिक्षा बोर्ड के अधिकारियों की लापरवाही के कारण हजारों विद्यार्थियों को परेशानी का सामना करना पड़ रह है। बोर्ड की नई योजना के तहत 10वीं तथा 12वीं के रि-अपीयर विद्यार्थियों को अपना फार्म ऑनलाइन भरना है, लेकिन बोर्ड की साइट में रि-पीयर फार्म भरने का लिंक ही नजर नहीं आ रहा है। यह लिंक 18 से 28 जून तक तो नजर आया लेकिन अब गायब है। रि-अपीयर फार्म अप्लाई करने की अंतिम तिथि 6 जुलाई है लेकिन लिंक नहीं होने के कारण हजारों विद्यार्थी यह फार्म अप्लाई नहीं कर पा रहे हैं। बोर्ड नियमों के अनुसार जो विद्यार्थी 6 जुलाई तक फार्म अप्लाई नहीं कर पाए तो उसके बाद उनको जुर्माना लगेगा। यह जुर्माना एक हजार रुपए तक हो सकता है। यदि फिर भी फार्म अप्लाई नहीं हो सका तो विद्यार्थी परीक्षा में बैठने से वंचित रह सकते हैं।
गौरतलब है कि अब से पहले हरियाणा विद्यालय शिक्षा बोर्ड में रि-अपीयर के फार्म डाक द्वारा भेजे जाते थे। इस वर्ष से बोर्ड ने नई सुविधा दी है। इसके तहत जिन विद्यार्थियों की 10वीं तथा 12वीं कक्षा में रि-अपीयर है, वे बोर्ड की साइट पर जाकर ऑनलाइन आवेदन कर सकते हैं। विद्यार्थियों को निर्धारित फीस बोर्ड के अकाउंट, जो कि पंजाब नेशनल बैंक का है, में जमा करवानी है तथा इसकी डिटेल साइट पर भरनी है। बोर्ड की साइट पर रि-अपीयर के लिए फार्म भरने का लिंक दिया हुआ है जोकि अब पूरी तरह से गायब हो चुका है। पिछले 4 दिन से विद्यार्थी इस लिंक को ढूंढ रहे हैं और साइबर कैफे के चक्कर लगा रहे हैं लेकिन यह लिंक नहीं मिल रहा है। 18 जून से 28 जून तक को यह लिंक मिला लेकिन उसके बाद गायब हो गया। हजारों विद्यार्थी फार्म अप्लाई करने के लिए भटक रहे हैं। इस बारे में बोर्ड अधिकारी व कर्मचारी को संतोषजनक जवाब नहीं दे पा रहे हैं। उनका कहना है कि यह टैक्निकल फाल्ट है, जो जल्द ही ठीक कर दिया जाएगा लेकिन कब तक ठीक होगा, यह पता नहीं है। यदि 6 जुलाई के बाद यह ठीक होता है, तो विद्यार्थियों पर जुर्माना लगना तय है, जिसका खामियाजा अभिभावकों को भुगतना पड़ेगा। बोर्ड की लापरवाही के कारण
हरियाणा बोर्ड की साईट का फोटो 
हजारों अभिभावक ठगे जाएंगे।

टोल फ्री नंबर भी दे गया जवाब

हरियाणा विद्यालय शिक्षा बोर्ड ने विद्यार्थियों तथा अभिभावकों की सुविधा के लिए एक टोल फ्री नंबर दिया गया है ताकि किसी भी समस्या के लिए विद्यार्थी तथा अभिभावक इस पर संपर्क करके अपनी समस्या का समाधान करवा सकें लेकिन पिछले काफी दिनों से यह टोल फ्री नंबर 18001804171भी खराब है। इस कारण भी अभिभावकों को कोई संतोषजनक जवाब नहीं मिल रहा है। बोर्ड प्रशासन इस तरफ भी कोई ध्यान नहीं दे रहा ताकि नंबर को ठीक करवाया जा सके।

जल्द करवा दिया जाएगा समस्या का समाधान : सचिव

इस बारे में हरियाणा विद्यालय शिक्षा बोर्ड सचिव डा. अनशज सिंह से बात की गई तो उन्होंने कहा कि अभी तक तो यह दिक्कत नहीं आई है लेकिन फिर भी कोई परेशानी है तो वह इस बारे में तकनीकी लोगों को समस्या का समाधान करने के निर्देश देंगे और जल्द ही समस्या का समाधान करा दिया जाएगा

Sunday, 30 June 2013

कुदरत के साथ छेड़छाड़ रोकनी है तो कीट ज्ञान हासिल करें किसान : ढुल

किसान खेत पाठशाला के दूसरे सत्र में किसानों को फसल में नजर आए नए कीट


जींद। पृथ्वी पर जीवन यापन के लिए मौजूद सभी सुविधाएं कुदरत का इंसान को एक अनोखा तोहफा हैं लेकिन आज इंसान अपने स्वार्थ के वशीभूत होकर कुदरत के इस अनमोल तोहफे के साथ खिलवाड़ कर रहा है। इसलिए भविष्य में इंसान को इसके गंभीर परिणाम भुगतने के लिए भी तैयार रहना होगा। अगर किसानों को कुदरत का साथ देना है तो उन्हें कीट ज्ञान हासिल करना होगा। यह बात ढुल खाप के प्रधान इंद्र सिंह ढुल ने शनिवार को राजपुरा भैण गांव में आयोजित डा. सुरेंद्र दलाल कीट साक्षरता किसान खेत पाठशाला के दूसरे सत्र के दौरान किसानों को सम्बोधित करते हुए कही। इस अवसर पर उनके साथ चहल खाप के प्रतिनिधि दलीप सिंह चहल और डा. सुरेंद्र दलाल के पुत्र अक्षत भी मौजूद थे। पाठशाला की अध्यक्षता बराह तपा के प्रधान कुलदीप ढांडा ने की तथा संचालन कृषि विकास अधिकारी डा. कमल सैनी ने किया। पाठशाला में राजपुरा भैण, ईंटल कलां, ईंटल खुर्द, निडाना, निडानी, रधाना, ईगराह, रामराये, चाबरी, ललीतखेड़ा सहित दर्जनभर गांवों के किसानों ने कपास की फसल में मौजूद कीटों पर रिसर्च किया। पाठशाला के आरंभ में सभी किसानों ने कीट बही खाता तैयार करने के लिए कपास की फसल में मौजूद मांसाहारी तथा शाकाहारी कीटों का आंकड़ा दर्ज किया। 
पाठशाला के आरंभ में किसानों ने फसल में कीटों का अवलोकन कर कीट बही खाता तैयार किया। कीट बही खाते में सफेद मक्खी की औसत प्रति पत्ता 1.9, हरे तेले की 1.8 और चूरड़े की 2.5 थी। किसानों ने बताया कि कीट बही खाते के अनुसार फसल में मौजूद शाकाहारी कीट कृषि वैज्ञानिकों द्वारा तैयार की गई लक्ष्मण से कोसों दूर हैं। किसानों ने बताया कि शाकाहारी कीटों के साथ-साथ फसल में मांसाहारी कीट क्राइसोपा, क्राइसोपा के अंडे, फलहेरी बुगड़ा, बिंदुआ बुगड़ा, हंडेर बीटल तथा मकड़ी भी काफी संख्या में मौजूद हैं। उन्होंने बताया कि इस बार कपास की फसल में कुछ नए कीट सलेटी भूंड, सुरंगी कीड़ा, टीडा भी नजर आए हैं। किसानों ने बताया कि कपास के इस खेत में कुल 4355 पौधे हैं और प्रति पौधा एक मांसाहारी कीट क्राइसोपा भी मौजूद है। एक क्राइसोपा 40 मिनट में 30 हरे तेलों तथा बुगड़े ढेड मिनट में 1 कीड़े का काम तमाम कर देते हैं। उन्होंने बताया कि कपास की फसल में किए गए रिसर्च के दौरान वह 43 किस्म के शाकाहारी तथा 161 किस्म के मांसाहारी कीटों की पहचान कर चुके हैं। डा. कमल सैनी ने बताया कि पृथ्वी पर सबसे पहले पौधों की उत्पति हुई थी। इसके बाद धरती पर कीटों ने दस्तक दी थी। क्योंकि जीवों को जीवित रहने के लिए आक्सिजन की जरुरत होती है और आक्सिजन की उत्पति का केवल एक मात्र साधन हैंपौधे। बिना पौधों के धरती पर जीवन संभव नहीं है। पृथ्वी पर पौधों की लगभग 3 लाख किस्म की प्रजातियां हैं। इनमें से अढ़ाई हजार किस्म के पौधों को किसान फसलों के रूप में जानते हैं । 
 पाठशाला के आरंभ में कीट बही खाता तैयार करने के लिए फसल में कीटों का अवलोकन करते किसान। 
डा. सैनी ने कहा कि फिजिक्स का नियम कहता है कि पृथ्वी पर जो वस्तु पैदा हुई है, वह कभी भी खत्म नहीं होती।  वह तो बस समय-समय पर अपना आकार बदलती रहता है। पृथ्वी में ऐसे सुक्ष्म जीवाणु हैं जो मृत जीव या बेकार की वस्तु को दोबारा से तोडफ़ोड़कर उसकी वास्तविक स्थिति में बदल देते हैं। प्रकृति अपने नियमानुसार ही किसी जीव को पैदा और नष्ट करती है। इसलिए हमें प्रकृति के साथ ज्यादा छेड़छाड़ करने की जरुरत नहीं है।उन्होंने कहा कि किसान भय व भ्रम के जाल में फंसकर कीटों को मारने में लगे हुए हैं, जबकि सच्चाई यह है कि कीड़ों को मारने की जरुरत नहीं है। अगर जरुरत है तो कीड़ों को पहचानने और उनके क्रियाकलापों को समझने की। जो केवल कीट ज्ञान से संभव है। बिना कीट ज्ञान के किसान भय व भ्रम की स्थिति से बाहर नहीं निकल सकते। उन्होंने कहा कि एक ताजा रिपोर्ट के अनुसार अमेरीका ने तो प्रकृति के साथ बढ़ती छेड़छाड़ को रोकने के लिए पौधों के साथ किसी भी प्रकार की छेडख़ानी करने पर पूर्ण रूप से प्रतिबंध लगा दिया है। कीटाचार्य मनबीर रेढ़ू और रामदेवा ने बताया कि कीट इंसान से ज्यादा ताकतवर होते हैं। इसलिए वह अपने ऊपर आने वाली विपत्ति को पहले ही भांप लेते हैं और अपने वंश को बचाने के लिए अपना जीवन चक्र छोड़ा कर अपने अंड़े देने की क्षमता में वृद्धि कर लेते हैं। उन्होंने सफेद मक्खी का उदहारण देते हुए कहा कि सफेद मक्खी का जीवन काल 72 दिन का होता है और यह एक सप्ताह में 100 से 150 अंडे देती है लेकिन आपदा के समय सफेद मक्खी अपने जीवनकाल को छोटा कर 21 दिन का कर लेती है। 

 पाठशाला में किसानों को सम्बोधित करते कृषि अधिकारी तथा मौजूद किसान।


Friday, 28 June 2013

खेती में पुरुषों से ज्यादा होता है महिलाओं का योगदान : ढांडा

विधिवत रूप से ललीतखेड़ा में हुआ महिला किसान खेत पाठशाला का शुभारंभ

जिला कृषि उपनिदेशक तथा जिला बागवानी अधिकारी सहित कई अधिकारियों ने की पाठशाला में शिरकत


जींद। इतिहास गवाह है कि खेती की खोज सबसे पहले महिलाओं ने की थी और आज भी खेती के कार्यों में पुरुषों से ज्यादा योगदान महिलाओं का है। एक सर्वे के अनुसार पुरुष खेती का सिर्फ 25 प्रतिशत कार्य ही करते हैं, जबकि बाकी बचा हुआ 75 प्रतिशत कार्य महिलाएं निपटाती हैं। यह बात बराह तपा के प्रधान कुलदीप ढांडा ने वीरवार को ललीतखेड़ा गांव में डा. सुरेंद्र दलाल कीट साक्षरता महिला खेत पाठशाला के शुभारंभ अवसर पर महिला किसानों को सम्बोधित करते हुए कही। इस अवसर पर पाठशाला में मुख्यातिथि के तौर पर मौजूद डा. सुरेंद्र दलाल की धर्मपत्नी कुसुम दलाल ने महिला किसानों को राइटिंग पैड तथा पैन देकर पाठशाला का शुभारंभ किया। जिला कृषि उपनिदेशक डा. आर.पी. सिहाग, जिला बागवानी अधिकारी डा. बलजीत भ्याण, ज्ञान-विज्ञान समिति से सोहनदास, निडाना स्कूल के मुख्याध्यापक धर्मबीर सिंह, ए.डी.ओ. डा. कमल सैनी, डा. नेमकुमार, डा. यशपाल भी विशेष रूप से मौजूद थे।
जिला कृषि उपनिदेशक डा. आर.पी. सिहाग तथा जिला बागवानी अधिकारी डा. बलजीत भ्याण ने कहा कि निस्वार्थ सेवा भाव से शुरू किया गया कोई भी कार्य अवश्य ही पूरा होता है। ललीतखेड़ा, निडाना तथा निडानी की महिलाओं ने कीटों को बचाने तथा थाली को जहरमुक्त बनाने की जो मुहिम शुरू की है, वह किसी व्यक्ति विशेष की मुहिम नहीं है। यह तो पूरे समाज की मुहिम है। कृषि विकास अधिकारी डा. कमल सैनी ने कहा कि कीटों की पहचान का काम सबसे आसान काम है। अगर किसान प्रतिदिन 1 घंटा भी अपनी फसल में मौजूद कीटों का अवलोकन कर उनके क्रियाकलापों की जानकारी जुटाए तो कुछ ही दिन में वह कीटाचार्य बनकर फसल में प्रयोग होने वाले रासायनिक उर्वरकों के खर्च को कम कर सकता है। डा. सैनी ने कहा कि हमारे शास्त्रों में जीव हत्या को सबसे बड़ा पाप माना गया है लेकिन किसान भय व भ्रम के जाल में फंसकर निरंतर इस पाप में भागीदार बन रहे हैं। डा. सैनी ने कहा कि कीटों का प्रकृति के साथ बड़ा गहरा रिश्ता है। इसलिए हमें इस रिश्ते की अहमियत को समझते हुए प्रकृति और कीटों को बचाने के लिए कीट ज्ञान अर्जित करना चाहिए। उन्होंने कहा कि निडाना, निडानी तथा ललीतखेड़ा गांव की महिलाओं द्वारा पिछले 3 वर्षों से जो महिला
 महिला किसानों को राइटिंग पैड तथा पैन देकर पाठशाला का शुभारंभ करती मैडम कुसुम दलाल।
पाठशाला चलाई जा रही है, वह एक तरह से अनोखी मुहिम है। क्योंकि पूरे उत्तर भारत में खेती के क्षेत्र में कहीं पर भी महिलाओं की कोई पाठशाला नहीं चल रही है। उन्होंने कहा कि आज कीट ज्ञान क्रांति के जन्मदाता डा. सुरेंद्र दलाल हमारे बीच नहीं है। उनकी कमी उन्हें हमेशा खलती रहेगी। डा. सुरेंद्र दलाल के देहांत के बाद से इस मुहिम को आगे बढ़ाने की पूरी जिम्मेदारी महिलाओं के कंधों पर है। इसलिए महिलाओं को इस मुहिम को आगे बढ़ाने के लिए तहदिल से अपना सहयोग देना होगा। महिला किसान मीनी मलिक ने बताया कि यहां की महिलाएं वर्ष 2010 से इस मुहिम से जुड़ी हुई हैं। 15 जून 2010 को निडाना के खेतों महिला किसान खेत पाठशाला की शुरूआत हुई थी। उन्होंने बताया कि कपास की फसल में सबसे पहले शाकाहारी कीट के रूप में चूरड़ा आता है और इसके बाद हरातेला तथा सफेद मक्खी दस्तक देती हैं। शाकाहारी कीटों के साथ ही मांसाहारी कीट भी फसल में आते हैं। सुदेश मलिक ने पाठशाला के महत्व के बारे में बताया तथा पाठशाला को आगे बढ़ाने के लिए 1100 रुपए की आर्थिक सहायता दी। कुसुम दलाल ने महिला किसानों को पाठशाला को आगे बढ़ाने के लिए उनकी तरफ से हर संभव सहायता देने का आह्वान किया। ज्ञान-विज्ञान समिति से आए सोहनदास तथा मुख्याध्याक धर्मबीर ने भी अपने विचार रखे। महिलाओं ने कीटों पर तैयार किए गए गीत 'कीडय़ां का कट रहया चाला ऐ मैने तेरी सूं, देखया ढंग निराला ऐ मैने तेरी सूं' तथा 'मैं बीटल हूं मैं कीटल हूं, तुम समझो मेरी मैहता को' गीत से पाठशाला का समापन किया। 
 पाठशाला में महिला किसानों को सम्बोधित करते कृषि विभाग के अधिकारी तथा मौजूद महिला किसान।

Sunday, 23 June 2013

कीटों को नियंत्रण करने में कीट ही सबसे बड़ा हथियार : डा. सैनी

कहा, प्रकृति ने सभी जीवों के लिए तय किए हैं नियम 
पाठशाला में किसानों ने कीटों का अवलोकन कर सीखे जहरमुक्त खेती के गुर


जींद। कीट साक्षरता के अग्रदूत डा. सुरेंद्र दलाल द्वारा थाली को जहरमुक्त बनाने के लिए जिले में शुरू की गई मुहिम को आगे बढ़ाने के लिए शनिवार को कीट कमांडों किसानों तथा कृषि विभाग के सौजन्य से राजपुरा भैण गांव में किसान खेत पाठशाला का शुभारंभ किया गया। डा. सुरेंद्र दलाल के छोटे भाई विजय दलाल ने किसानों को कापी, पैन वितरित कर पाठशाला का शुभारंभ किया। कृषि विभाग के ए.डी.ओ. कमल सैनी तथा कीट मित्र किसान कमेटी के प्रधान रणबीर मलिक ने जहरमुक्त खेती की इस मुहिम को आगे बढ़ाने का संकल्प लिया। इस अवसर पर जिला बागवानी अधिकारी डा. बलजीत भ्याण, कृषि विभाग सफीदों उपमंडल के एस.डी.ओ. डा. सत्यवान आर्य, बराह तपा प्रधान कुलदीप ढांडा, चहल खाप के संरक्षक दलीप सिंह चहल, किसान क्लब के प्रधान राजबीर कटारिया विशेष रूप से मौजूद थे। 
डा. बलजीत भ्याण तथा डा. सत्यवान आर्य ने किसानों को सम्बोधित करते हुए कहा कि डा. सुरेंद्र दलाल की इस मुहिम को आगे बढ़ाना ही उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि होगी। बराह तपा के प्रधान कुलदीप ढांडा तथा चहल खाप के संरक्षक दलीप  सिंह चहल ने खापों की तरफ से किसानों को पूरा सहयोग देने का आश्वासन दिया। इसके बाद किसानों ने 5-5 किसानों के 6 ग्रुप बनाकर कपास की फसल में कीटों का अवलोकन किया। कीट अवलोकन के बाद कीट बही-खाता तैयार किया गया। किसान मनबीर रेढ़ू ने कहा कि फसल के उत्पादन में खेत में पौधों की पर्याप्त संख्या जरुरी है। रेढ़ू ने कहा कि एक एकड़ जमीन की लंबाई 220 तथा चौड़ाई 198 होती है। अगर किसान 3 बाई 3 की दूरी पर कपास के बीज की बिजाई करते हैं तो एक एकड़ में 73 लाइन बनेंगी और एक लाइन में 66 पौधे लगेंगे। इस प्रकार एक एकड़ में 4818 पौधे लगेंगे लेकिन उन्होंने पाठशाला के दौरान जिस खेत का अवलोकन किया है उस खेत में 4355 पौधे हैं और प्रत्येक पौधे पर औसतन 10 पत्ते हैं। इस पूरी फसल में कुल 43550 पत्ते हैं। पाठशाला में मौजूद किसानों द्वारा फसल के निरीक्षण के बाद तैयार किए गए बही खाते के आंकड़े के अनुसार पूरे खेत में कुल 46 हजार की संख्या में सफेद मक्खी और 46 हजार की संख्या में ही हरातेला तथा 60 हजार की संख्या में चूरड़ा फसल में मौजूद हैं। रेढ़ू ने बताया कि इसके अलावा इन कीटों को खाने वाले मांसाहारी कीट भी पूरी तादात में खेत में मौजूद हैं। 
 चार्ट पर कीटों का बही खाता तैयार करते किसान।
कपास के इस खेत में क्राइसोपा, क्राइसोपा के बच्चे, मकड़ी, बिंदुआ बुगड़ा तथा कातिल बुगड़ा भी मौजूद हैं। एक क्राइसोपा तथा एक बिंदुआ बुगड़ा एक दिन में 250-250 के करीब सफेद मक्खी, चूरड़े तथा हरेतेले का काम तमाम कर देते हैं और मकड़ी की खुराक तो इन सबसे ज्यादा है। इसलिए किसानों को फसल में मौजूद शाकाहारी कीटों से डरने की जरुरत नहीं है। किसान चतर  सिंह ने बताया कि कीट बही खाते के आंकड़ों के अनुसार इस खेत में प्रति पौधा 1.1 सफेद मक्खी, 1.1 हरातेला तथा 1.4 चूराड़ा की औसत आई है। कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार अगर कपास की फसल में प्रति पौधा सफेद मक्खी की औसत 6, हरेतेले की औसत 2 तथा चूरड़े की औसत 10 प्रति पत्ता हो तो ही ये शाकाहारी कीट फसल में नुक्सान पहुंचाने के सत्र पर होते हैं लेकिन आंकड़ों पर नजर डाली जाए तो अभी तक ये कीट हमारी फसल में नुक्सान पहुंचाने के सत्र से कोसों दूर हैं। डा. कमल सैनी ने कहा कि कीटों का आपसी तालमेल काफी अच्छा होता है। कपास की इस फसल में सूरा नामक कीट काफी तादात में मौजूद है। जबकि सूरा कीट सरसों की फसल का कीड़ा है लेकिन अब यह कीड़ा कपास की फसल में भी मौजूद है। सैनी ने बताया कि सूरा कीट के साथ-साथ उसका शिकारी कातिल बुगड़ा नामक मांसाहारी कीट भी काफी मात्रा में मौजूद है। इसलिए किसानों को इस कीट से भयभीत होने की जरुरत नहीं है। क्योंकि कीट को नियंत्रण करने में कीट ही सबसे बड़ा हथियार होता है और प्रकृति ने पृथ्वी पर मौजूद सभी जीवों के लिए नियम तय किए हैं। इस अवसर पर पाठशाला में राजपुरा भैण, ईंटल,  सिंसर, छापड़ा, ईगराह, निडानी, निडाना, ललीतखेड़ा, रधाना, चाबरी, सिरसाखेड़ी गांवों से लगभग 50 किसान पाठशाला में मौजूद थे। 

पाठशाला के शुभारंभ अवसर पर किसानों को कापी, पैन देते विजय दलाल तथा फसल पर कीटों का अवलोकन करते किसान। 

मानव जाति पर कस रहा कैंसर का शिकंजा

कैंसर के कारण हर वर्ष मौत के मुंह में समा जाती हैं लाखों जिंदगियां


जींद। कैंसर जैसी लाइलाज बीमारी का शिकंजा मानव पर लगातार कसता जा रहा है। कैंसर के मरीजों की बेहताशा वृद्धि के कारण सम्पूर्ण मानव जाति परेशान है। आज कैंसर ने एक गंभीर चुनौति का रूप धारण कर लिया है। अगर विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट पर नजर डाली जाए तो हर वर्ष लगभग 6 करोड़ लोगों की मौत होती है और इनमें से अकेले 76 लाख लोग कैंसर के कारण काल का ग्रास बनते हैं। इसके अलावा 2 लाख 20 हजार लोग प्रति वर्ष पेस्टीसाइड प्वाइजनिग के कारण यानि जहर के सेवन से मरते हैं। अगर इसी संगठन की रिपोर्ट पर गौर फरमाया जाए तो कैंसर जैसी बीमारी का फैलने का मुख्य कारण सामने आता है किसानों द्वारा खाद्य पदार्थो यानि फसलों में कीटनाशकों का अंधाधुंध प्रयोग करना। डब्ल्यू.एच.ओ. की एक रिपोर्ट के अनुसार खेतों में कीटनाशकों के स्प्रे नहीं करने वाले किसानों के मुकाबले कीटनाशकों के स्प्रे करने वाले किसानों में कैंसर होने की संभावना संख्यकीय तौर पर ज्यादा है। आपको यह जानकार आश्चर्य होगा कि देश में फसलों पर हर वर्ष 25 लाख टन पेस्टीसाइड का प्रयोग होता है। इस प्रकार हर वर्ष 10 हजार करोड़ रुपए खेती में इस्तेमाल होने वाले पेस्टीसाइडों पर खर्च हो जाते हैं। फसलों में अत्याधिक पेस्टीसाइड के इस्तेमाल से आज दूध, सब्जी, पानी तथा हर प्रकार के खाद्य पदार्थों पर जहर का प्रभाव बढ़ रहा है। इस प्रकार प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप से हर रोज काफी मात्रा में जहर हमारे शरीर में प्रवेश कर हमारी प्रतिरोधक क्षमता को कमजोर कर रहा है। पेस्टीसाइड के अत्याधिक प्रयोग से केवल कैंसर ही नहीं बल्कि हार्ट अटैक, शुगर, लकवा, पौरुष हीनता, सैक्स समस्या जैसी न जाने कितनी बीमारियां हमारे शरीर में घर कर रही हैं। यू.एस.ए. की पर्यावरण संरक्षण एजैंसी के अनुसार दुनिया में विभिन्न किस्म के पेस्टीसाइडों में से 68 किस्म के ऐसे फंजीनाशक, फफुंदनाशक, खरपतवार नाशक और कीटनाशक हैं जो कैंसर कारक सिद्ध हो चुके हैं लेकिन इसके बावजूद भी भारत में इन पेस्टीसाइडों का धड़ले से प्रयोग हो रहा है। देश में पेस्टीसाइड ने सबसे पहले काजू बैलट में दस्तक दी और उसके बाद कॉटन बैलट में भी पैर जमा लिए। इसके बाद धीरे-धीरे धान व सब्जियों की फसलों और अब तो हर तरह की फसलों में इसका इस्तेमाल बढ़ता जा रहा है और आज परिणाम हमारे सामने हैं। पंजाब में तो हालात और भी बुरे हैं। यहां बड़े-बड़े शहरों में ट्रेन के रूप में कैंसर एक्सप्रेस ही नहीं बल्कि टैक्सी स्टैंडों पर भी कैंसर के मरीजों को राजस्थान के बीकानेर में स्थित कैंसर के अस्पताल में लाने-लेजाने के लिए कैंसर टैक्सियों के नाम से गाडिय़ां आसानी से मिल जाती हैं। पंजाब में कैंसर के मरीजों की तादात बढऩे का मुख्य कारण है यहां पेस्टीसाइड का अत्याधिक इस्तेमाल। पंजाब के बाद अब हरियाणा भी कैंसर की चपेट में आ चुका है।फसलों से अधिक उत्पादन की चाह में किसान अंधाधुंध पेस्टीसाइडों का इस्तेमाल कर रहे हैं लेकिन किसानों का यह लालच मानव जाति के लिए एक बड़ा खतरा बन रहा है। इसके लिए हम सारा दोष अकेले किसान को भी नहीं दे सकते, क्योंकि हमारी सरकार भी इसमें बराबर की जिम्मेदार है। इतने बड़े खतरे की दस्तक के बाद भी सरकार की नींद नहीं टूट रही है। इसी का परिणाम है कि आज स्वास्थ्य पर अप्रत्यक्ष रूप से हमारा खर्च लगातार बढ़ता जा रहा है। कैंसर जैसे बड़े खतरे को देखते हुए सबसे पहले कृषि विभाग को जागने की जरुरत है। इसके लिए कृषि विभाग को हरियाणा के जींद जिले के निडाना-निडानी के आस-पास के गांवों के किसानों से प्रेरणा लेने की जरुरत है। क्योंकि यहां के किसानों ने कीट ज्ञान की मशाल जलाकर किसानों को नई दिशा देने का काम किया है। यहां सैंकड़ों ऐसे किसान हैं, जो बिना कीटनाशकों के इस्तेमाल के अन्य किसानों से अच्छा उत्पादन लेकर लोगों की थाली को जहरमुक्त करने के प्रयास में लगे हुए हैं। अगर इन किसानों के अनुभव को सही नजरिये से देखा जाए तो किसानों को कीटनाशकों की नहीं बल्कि कीट ज्ञान की जरुरत है। फसलों में पाए जाने वाले कीटों की पहचान तथा उनके क्रियाकलापों को जानने की जरुरत है। क्योंकि कीट ज्ञान के हथियार के बिना इस पेस्टीसाइड के चक्रव्यूह को भेद पाना किसानों के लिए संभव नहीं है। 

Tuesday, 18 June 2013

अब कृषि विभाग के अधिकारियों को कीट ज्ञान के क, ख, ग, सिखाएंगी कीटों की मास्टरनियां

जहरमुक्त खेती की मुहिम को आगे बढ़ाने के लिए कीटों की मास्टरनियों ने कृषि विभाग को भेजा पत्र


जींद। थाली को जहरमुक्त करने के लिए किसानों को कीट ज्ञान का संदेश देने वाली कीटों की मास्टरनियां अब किसानों के साथ-साथ कृषि विभाग के अधिकारियों को भी कीट ज्ञान के क, ख, ग सिखाएंगी। इसके लिए निडाना, ललीतखेड़ा और निडानी की वीरांगनाओं ने कृषि विभाग जींद के उप-निदेशक डा. आर.पी. सिहाग को पत्र भेजकर उनकी इस मुहिम में सहयोग की मांग की है। उप-निदेशक ने महिलाओं की इस मांग को स्वीकार करते हुए विभाग के 5-5 अधिकारियों को सप्ताह में एक-एक दिन महिला किसान खेत पाठशाला ललीतखेड़ा तथा किसान खेत पाठशाला राजपुरा भैण में जाकर कीट ज्ञान अर्जित करने के निर्देश जारी किए हैं।
अज्ञान के कारण फसलों में उर्वकों का अंधाधुंध इस्तेमाल कर रहे किसानों को ज्ञान रुपी प्रकाश दिखाकर जहरमुक्त खेती के लिए प्रेरित करने के लिए कीट साक्षरता के अग्रदूत डा. सुरेंद्र दलाल ने वर्ष 2008 में निडाना गांव के खेतों से कीट क्रांति की मशाल जलाई थी। इसके बाद इस मुहिम को तेजी से आगे बढ़ाने के लिए वर्ष 2010 में महिलाओं को भी इस मुहिम से जोड़कर निडाना से ही महिला किसान खेत पाठशाला की शुरूआत हुई थी। इस पाठशाला में निडाना तथा निडानी की वीरांगनाओं को कीट ज्ञान की ट्रेनिंग दी गई थी। इस पाठशाला से कीट ज्ञान की डिग्री लेने के बाद इन वीरांगनाओं ने इसी तर्ज पर वर्ष 2012 में ललीतखेड़ा गांव में महिला किसान खेत पाठशाला का सफल आयोजन किया था और कपास की फसल में आने वाले कीटों पर 20 सप्ताह तक सफल प्रयोग भी किए थे। पाठशाला में महिलाओं ने 208 कीटों की पहचान की। इसमें 47 शाकाहारी तथा 161 मांसाहारी कीट शामिल हैं। कीट ज्ञान के बूते ही महिलाओं ने फसल में बिना कीटनाशकों का प्रयोग किए अच्छा उत्पादन भी लिया। इस मुहिम में महिलाओं को आगे बढ़ाने में डा. सुरेंद्र दलाल की अहम भूमिका रही थी लेकिन दुर्भाग्यवश गंभीर बीमारी की चपेट में आने के कारण 3 माह तक अस्पताल में जिंदगी और मौत से जूझने के बाद 18 मई 2013 को किसानों के मसीहा डा. सुरेंद्र दलाल दुनिया से विदा हो गए। डा. सुरेंद्र दलाल के कुशल नेतृत्व के अभाव को भांपते हुए कीटों की इन मास्टरनियों ने कृषि विभाग के अधिकारियों को इस मुहिम में अपना पथदर्शक बनाने की योजना तैयार की है। इसके लिए पाठशाला की आयोजक पूनम मलिक, सविता मलिक, मीनी मलिक, गीता देवी ने कृषि विभाग के आला अधिकारियों को पत्र भेजा है। निडाना, निडानी तथा ललीतखेड़ी की वीरांगनाओं द्वारा भेजे गए इस पत्र में कृषि विभाग जींद के उप-निदेशक डा. आर.पी. सिहाग को इस मुहिम से जुड़कर कीट ज्ञान की इस मुहिम को आगे बढ़ाने के लिए सहयोग करने की गुजारिश की है। उप-निदेशक ने महिलाओं की मांग को स्वीकार करते हुए इस मुहिम को आगे बढ़ाने में हर संभव मदद देने का आश्वासन दिया है। इसके अलावा उप-निदेशक ने विभाग से 5-5 अधिकारियों को सप्ताह में एक दिन ललीतखेड़ा में चलने वाली महिला किसान खेत पाठशाला तथा राजपुरा भैण में चलने वाली किसान खेत पाठशाला में जाकर कीट ज्ञान अर्जित करने के निर्देश भी जारी किए हैं, ताकि कृषि विभाग के अधिकारी यहां की वीरांगनाओं से कीट ज्ञान के क, ख, ग सीखकर अधिक से अधिक किसानों को इस मुहिम से जोड़कर लोगों की थाली को जहरमुक्त करने में अपना योगदान दे सकें। कीट कमांडों किसानों द्वारा 22 जून से राजपुरा भैण में किसान खेत पाठशाला तथा ललीतखेड़ा, निडाना, निडानी की वीरांगनाओं द्वारा 27 जून से ललीतखेड़ा में महिला किसान खेत पाठशाला का श्रीगणेश किया जाएगा। खरीफ सीजन के दौराान लगातार 20 सप्ताह तक यह पाठशालाएं चलेंगी।
ललीतखेड़ा में चल रही महिला किसान खेत पाठशाला का फाइल फोटो। 

डा. सुरेंद्र दलाल ने किसानों को दिया कीट ज्ञान का अचूक हथियार

डा. सुरेंद्र दलाल ने थाली को जहरमुक्त बनाने के लिए जींद जिले के किसानों को कीट ज्ञान का अचूक हथियार दिया है। ललीतखेड़ा, निडाना, निडानी की महिलाओं तथा पुरुष किसानों ने उनके पास पत्र भेजकर इस मुहिम को आगे बढ़ाने में सहयोग देने की अपील की है। विभाग द्वारा उनकी मांग को स्वीकार कर लिया गया है और उन्हें इस अभियान को आगे बढ़ाने में हर संभव मदद दी जाएगी। कृषि विभाग के अधिकारियों को भी कीट ज्ञान हासिल करने के लिए इन पाठशालाओं से जोड़ा जाएगा। सप्ताह में 1 दिन विभाग के 5-5 अधिकारियों की ड्यूटी इन पाठशालाओं में लगाई जाएगी।
डा. आर.पी. सिहाग, उप-निदेशक
कृषि विभाग, जींद  

खुद को पर्यावरण के लिए महिला वकील ने कर दिया समर्पित

अब तक लगवा चुकी 177 त्रिवेणी जींद। महिला एडवोकेट संतोष यादव ने खुद को पर्यावरण की हिफाजत के लिए समर्पित कर दिया है। वह जींद समेत अब तक...