Monday, 28 January 2013

बेसहारों को नहीं मिल रहा कोई सहारा



अभी तक जिला प्रशासन द्वारा नहीं की गई रैन बसेरों की कोई व्यवस्था 

कड़ाके की ठंड में खुले आसमान के नीचे रात गुजारने को मजबूर हैं बेसहारा लोग


जींद। कंपकपाने वाली सर्दी पडऩी शुरू हो गई है लेकिन अभी तक जिला प्रशासन द्वारा बेसहारा लोगों के लिए जिले में कहीं भी रैन बसेरे की कोई व्यवस्था नहीं की गई है। प्रशासन द्वारा रैन बसेरे की व्यवस्था करना तो दूर की बात अभी तक तो अलाव के लिए भी कोई इंतजाम नहीं किए गए हैं। जिसके सहारे बेसहारा लोग इस ठंड के मौसम में अपनी रात गुजार सकें। सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के बावजूद भी जिले में रैन बसेरे की योजना कागजों से बाहर नहीं निकल पाई है। अभी तक तो प्रशासनिक अधिकारी सिर्फ रैन बसेरों की व्यवस्था की योजना पर विचार ही कर रहे हैं। प्रशासनिक अधिकारियों की इस लापरवाही के चलते कड़ाके की ठंड में बेसहारा लोग खुले आसमान के नीचे ही रात गुजारने को मजबूर हैं।
बेसहारा लोगों को सर्दी से बचाने के लिए उनके रात्रि ठहराव के लिए पिछले वर्ष सुप्रीम कोर्ट ने रैन बसेरों और अलाव के इंतजाम के आदेश जारी किए थे। ताकि ठंड के मौसम में बेसहारा लोगों को आसरा मिल सके और ठंड के कारण किसी मजदूर या बेसहारा की मौत ना हो। शहर में रैन बसेरों और अलाव की व्यवस्था जिला प्रशासन को अपने स्तर पर करनी थी। सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के अनुसार रैन बसेरों व अलाव की व्यवस्था करने के साथ-साथ उनके प्रचार-प्रसार की जिम्मेदारी भी प्रशासन की होती है लेकिन जिला प्रशासन द्वारा अभी तक इस तरफ कोई कदम नहीं बढ़ाए गए हैं। सर्दी का मौसम चरम पर होने के बावजूद अभी तक जिले में स्थाई और अस्थाई रैन बसेरों के निर्माण की योजना फाइलों से बाहर नहीं निकल पाई है। इस योजना पर अमल करना तो दूर की बात अभी तक प्रशासन ने इस पर विचार नहीं किया है। रैन बसेरों के निर्माण की तरफ से प्रशासनिक अधिकारियों की यह बेरूखी इस बात की तरफ इशारा कर रही है कि प्रशासनिक अधिकारियों पर सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का भी कोई प्रभाव नहीं है। अधिकारियों की लापरवाही के चलते बेसहारा लोग खुले आसमान के नीचे ही रात बिताने को मजबूर हैं।

अभी तक प्रचार-प्रसार की भी नहीं की गई कोई व्यवस्था

सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के अनुसार जिले में रैन बसेरे और अलाव की व्यवस्था करने के साथ-साथ पूरे जोर-शोर से उनका प्रचार-प्रसार भी किया जाना चाहिए। ताकि अधिक से अधिक लोगों को रैन बसेरों की साइट के बारे में पता चल सके और वे उनका लाभ ले सकें लेकिन अभी तक जिला प्रशासन की तरफ से रैन बसेरों के प्रचार-प्रसार की बात तो दूर अभी तक रैन बसेरों की ही व्यवस्था नहीं की गई है।
स्थाई तौर पर रैन बसेरे की योजना पर किया जा रहा है विचार
इस बारे में जब रैड क्रॉस सोसायटी के सचिव रणदीप श्योकंद से बातचीत की गई तो उन्होंने बताया कि सफीदों में अंटा वाली धर्मशाला, नरवाना में सिक्खों की धर्मशाला तथा जींद में जाट धर्मशाला में रैन बसेरे की व्यवस्था की जा रही है। इसके अलावा जींद में अपोलो चौक, सफीदों रोड स्थित झोटा फार्म तथा शहर के सामान्य अस्पताल में रैड क्रॉस की जो एक एकड़ जमीन है उस पर स्थाई तौर पर रैन बसेरे के निर्माण की योजना तैयार की जा रही है। प्रचार-प्रसार के लिए बैनर तैयार करवाए जा रहे हैं।  

प्रचार-प्रसार के लिए जल्द करेंगे व्यवस्था

सुप्रीम कोर्ट के आदेशानुसार प्रशासन द्वारा जिले में रैन बसेरों तथा अलाव की व्यवस्था की जिम्मेदारी रैड क्रॉस सोसायटी को सौंपी गई है। रैन बसेरों की व्यवस्था के साथ-साथ उनके प्रचार-प्रसार के लिए भी रैड क्रॉस के अधिकारियों को निर्देश जारी किए जाएंगे।
दलबीर सिंह
एस.डी.एम. जींद

यहां कर्मचारी नहीं खुद तलाशने होते हैं जन्म-मृत्यु प्रमाण पत्र


6-6 कर्मचारियों की तैनाती के बावजूद यहां सब कुछ राम भरोसे

स्वास्थ्य विभाग के अधिकारी यहां की बदइंतजामियों पर रोक लगाने में नाकाम

जींद। यहां कर्मचारी नहीं खुद उन लोगों को अपनों के जन्म और मृत्यु प्रमाण पत्र तलाशने होते हैं, जिन्होंने इनके लिए आवेदन किया होता है। यहां 6-6 कर्मचारियों की नियुक्ति के बावजूद सब कुछ राम भरोसे है। कोई किसी का जन्म-मृत्यु प्रमाण  पत्र ले जाए तो यहां के कर्मचारियों की बला से। उन्हें इससे कोई सरोकार नहीं है। 
यह कड़वी और चौंकाने वाली सच्चाई है जींद के सामान्य अस्पताल की जन्म-मृत्यु प्रमाण पत्र जारी करने वाली उस  ङ्क्षवग की, जो सिविल सर्जन से लेकर स्वास्थ्य विभाग के दूसरे अधिकारियों की नाक हर मौके पर कटवाने का काम करती रही है। वीरवार को 'पंजाब केसरी' की टीम ने यहां का मुआयना किया तो यहां इसी तरह का नजारा था जब यहां का बेहद अहम रिकार्ड कार्यालय से बाहर बरामदे में पटक दिया गया था। इस रिकार्ड से लोग अपनों के जन्म और मृत्यु के प्रमाण पत्र खंगालने और तलाशने में लगे हुए थे। यहां प्रमाण पत्र लेने के लिए आए लोगों को कर्मचारियों का काम खुद ही करना पड़ रहा था। लोगों के सामने फाइलों का ढेर लगा हुआ था और लोग उन फाइलों से खुद ही अपने प्रमाण पत्र ढुंढ़ रहे थे। 'पंजाब केसरी' की टीम ने जब इन लोगों से बातचीत की तो इन लोगों ने टीम के सामने अपना दुखड़ा रोते हुए अपनी परेशानी ब्यां की।
गांव गांगोली निवासी महाबीर ने बताया कि उसने अपने बेटे का जन्म प्रमण पत्र लेने के लिए उसने 3 नवंबर को फार्म भरकर जन्म-मृत्यु प्रमाण पत्र कार्यालय में जमा करवा था। वह पिछले एक माह से कार्यालय के चक्कर काट रहा है लेकिन कार्यालय में मौजूद कर्मचारी उसे प्रमाण पत्र देने की बजाए एक-दो दिन में दोबारा आने की बात कह कर टरका देते हैं। यहां उसकी कोई सुनवाई नहीं हो रही है। महाबीर ने बताया कि आज जब वह कार्यालय में जन्म प्रमाण पत्र लेने के लिए पहुंचा तो कार्यालय के कर्मचारियों ने कई फाइल उसके हाथ में थमाते हुए कह दिया कि बाहर बैठकर इन फाइलों में से अपना प्रमाण पत्र खुद ढुंढ़ लो, लेकिन इन फाइलों में भी जब उसे उसके बेटे का जन्म प्रमाण पत्र नहीं मिला तो कर्मचारियों ने उसे दो-चार दिन में दोबारा आने की बात कहकर अपना पल्ला झाड़ दिया। एक माह बाद भी उसे जन्म प्रमाण पत्र नहीं मिल पाया है। कार्यालय में कार्यरत कर्मचारियों का रवैया ठीक नहीं है।
नारायणगढ़ निवासी अजय तथा इस्माइलपुर निवासी मोहन लाल ने बताया कि उन्हें पासपोर्ट बनवाना है। पासपोर्ट बनवाने के लिए उन्हें अपने जन्म प्रमाण पत्र की जरूरत है। अजय तथा मोहन लाल ने बताया कि उन्होंने लगभग 3 माह पहले जन्म-मृत्यु प्रमाण पत्र कार्यालय में जन्म प्रमाण पत्र लेने के लिए फार्म जमा करवाया था। फार्म जमा करवाने के बाद कार्यालय के कर्मचारियों ने उन्हें एक माह का समय दिया था। अब वह पिछले 2 माह से अपना प्रमाण पत्र लेने के लिए कार्यालय के चक्कर काट रहे हैं लेकिन अभी तक उन्हें उनका जन्म प्रमाण पत्र नहीं मिल पाया है। उन्हें हर बार या तो यह कहकर टाल दिया जाता है कि अभी उनका प्रमाण पत्र तैयार नहीं हुआ है, या फिर उनके हाथों में फाइल थमा कर इन फाइलों में से अपना प्रमाण पत्र ढुंढऩे के लिए कह देते हैं। उन्होंने बताया कि कार्यालय के कर्मचारियों की लापरवाही से उनका पासपोर्ट का काम नहीं हो पा रहा है। 
गांव डूमराखां निवासी प्रदीप ने बताया कि वह डेढ़ माह से जन्म प्रमाण पत्र के लिए कार्यालय के चक्कर काट रहा है लेकिन अभी तक उसे जन्म प्रमाण पत्र नहीं मिला है। कार्यालय में कार्यरत कर्मचारी उसे फाइलों में से स्वयं अपना जन्म प्रमाण पत्र ढुंढऩे की बात कह देते हैं लेकिन कार्यालय में फाइलों का ढेर लगा हुआ है। इनती फाइलों में से वह किस तरह से अपना प्रमाण पत्र ढुंढ़े उसे कुछ समझ नहीं आ रहा है। गांव बराहा खुर्द निवासी दरवेश ने कहा कि उसे दाखिले के लिए जन्म प्रमाण पत्र की जरूरत है लेकिन वह पिछले 3 माह से जन्म-प्रमाण पत्र कार्यालय के चक्कर काट रहा है उसे अभी तक न तो जन्म प्रमाण पत्र मिला है और ना ही कर्मचारी कोई संतुष्ट जवाब दे रहे हैं। कर्मचारियों की लापरवाही से उसका दाखिले का काम रूका हुआ है। 

बेटे के जन्म पत्र में नाम ठीक करवाने के लिए 23 जुलाई 2012 को यहां फाइल जमा करवाई थी। फाइल जमा करवाए उसे 5 माह हो चुके हैं लेकिन अभी तक उसका काम नहीं हुआ है। 5 माह से वह बेटे का नाम ठीक करवाने के लिए कार्यालय के चक्कर काट रहा है लेकिन नाम ठीक करना तो दूर की बात यहां मौजूद कर्मचारी उसे उसकी फाइल की स्थिति के बारे में ही जानकारी नहीं दे रहे हैं। 
बूरा राम का फोटो।
बूराराम
गांव रेवर


जन्म प्रमाण पत्र में नाम ठीक करवाने के लिए 4 अक्तूबर को फाइल जमा करवाई थी लेकिन अभी तक जन्म प्रमाण पत्र में नाम ठीक नहीं किया है। वह कार्यालय के चक्कर लगा-लगाकर थक गया है लेकिन कार्यालय में मौजूद कर्मचारी कब तक उसका काम कर देंगे इसके बारे में कुछ बताने को तैयार नहीं हैं। 
कृष्ण
गांव शामदो
कृष्ण कुमार का फोटो।

जन्म प्रमाण पत्र लेने के लिए 19 अक्तूबर को जींद कार्यालय में फाइल जमा करवाई थी। वह पिछले 2 माह से जन्म प्रमाण पत्र लेने के लिए कार्यालय के चक्कर काट रहा है लेकिन अभी तक उसे जन्म प्रमाण पत्र नहीं मिल पाया है। आज जब वह जन्म प्रमाण पत्र लेने के लिए यहां कार्यालय में पहुंचा तो उसे यह बताया गया कि अब उसे जन्म प्रमाण पत्र जींद की बजाए कैथल से मिलेगा। उसे यह बात समझ नहीं आ रही है कि जब उसका गांव जींद जिले में पड़ता है तो उसे जन्म प्रमाण पत्र के लिए कैथल क्यों भेजा जा रहा है।
 आत्माराम पेगां का फोटो।
आत्मा राम 
गांव पेगां


जन्म प्रमाण पत्र लेने के लिए 3 माह पहले कार्यालय में फार्म जमा करवाया था लेकिन अभी तक जन्म प्रमाण पत्र नहीं मिला है। आज जब वह प्रमाण पत्र लेने के लिए यहां कार्यालय में पहुंचा तो कार्यालय में कार्यरत कर्मचारियों ने उसे खुद ही फाइलों से अपना जन्म प्रमाण पत्र ढुंढऩे के लिए कह कर अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लिया। 
सुरेंद्र, नरवाना 
सुरेंद्र का फोटो।

बुधवार को नहीं मिलते प्रमाण पत्र

अस्पताल प्रशासन की लापरवाही के चलते जन्म-मृत्यु प्रमाण पत्र कार्यालय में कार्यरत कर्मचारियों के हौंसले इतने बुलंद हैं कि इन्होंने अपनी मनमर्जी के मुताबित नियम तय कर रखे हैं। कर्मचारियों ने कार्यालय के बाहर पोस्टर चस्पा कर लिखा हुआ है कि यहां बुधवार के दिन जन्म-मृत्यु प्रमाण पत्र लेने-देने का कार्य नहीं होगा। यहां सवाल यह उठता है कि आखिरी बुधवार को जन्म-मृत्यु प्रमाण पत्र लेने देने का कार्य क्यों बंद रखा जाता है। 

सिविल सर्जन के पास नहीं कुछ जवाब

इस बारे में जब सिविल सर्जन डा. राजेंद्र प्रसाद से बातचीत की गई तो उनके पास कोई ठोस जबाव नहीं था। डा. राजेंद्र प्रसाद ने बताया कि आज जन्म-मृत्यु प्रमाण पत्र कार्यालय के इंचार्ज छुट्टी पर हैं। छुट्टी से लोटने के बाद ही इस बारे में उनसे बातचीत की जाएगी।  

पूरे वर्ष प्रदेश के किसानों के लिए मार्गदर्शक बने रहे निडाना व ललितखेड़ा के किसान


निडाना व ललित खेड़ा के किसानों ने ढुंढ़ा कीटनाशकों का विकल्प 

पंजाब जैसे प्रगतिशील प्रदेश के किसानों को पढ़ाया कीटों की पढ़ाई का पाठ


जींद। किसानों में जागरूकता के अभाव के कारण फसलों में अधिक उर्वकों तथा कीटनाशकों के प्रयोग के कारण आज कैंसर, हार्ट अटैक, शुगर, सैक्स सम्बंधि कई लाइलाज बीमारियों ने इंसान को अपनी चपेट में ले लिया है। किसानों को जानकारी नहीं होने के कारण किसान लगातार कीटनाशकों के दलदल में धंसते ही जा रहे हैं लेकिन जिले के निडाना तथा ललितखेड़ा के किसानों ने प्रदेश के किसानों को नई राह दिखाने का काम किया है। एक तरफ जहां किसान फसलों के अधिक उत्पादन की चाह में फसलों में अंधाधुंध कीटनाशकों का प्रयोग कर रहे हैं, वहीं निडाना तथा ललितखेड़ा के किसानों ने बिना कीटनाशकों के अच्छा उत्पादन लेकर प्रदेश ही नहीं अपितू देश के किसानों के लिए एक मिशाल कायम की है। निडाना व ललितखेड़ा के किसानों ने फसलों में पाए जाने वाले शाकाहारी तथा मासाहारी कीटों को कीटनाशकों के विकल्प के रूप में तैयार किया है। कीटनाशकों के विरोध में 2008 में निडाना गांव के गौरे से शुरू हुई यह मुहिम 2012 तक जिले ही नहीं बल्कि प्रदेश के बाहर भी जा पहुंची। अपनी इस अनोखी पढ़ाई के कारण यहां के किसान पूरे वर्ष चर्चा का विषय बने रहे। 2012 में यहां के किसानों ने जहां खाप पंचायत का आयोजन कर इस मुहिम को एक नई दिशा दी, वहीं पंजाब जैसे प्रगतिशील प्रदेश के किसानों को भी कीटों की पढ़ाई सीखाकर कैंसर जैसी जानलेवा बीमारियों से मुक्ति पाने की संजीवनी दिखा दी। निडाना तथा ललितखेड़ा के किसानों ने फसलों में नए-नए प्रयोग कर 146 किस्म के मासाहारी तथा 43 किस्म के शाकाहारी कीटों की खोज की है जो फसलों में कीटनाशकों का काम करते हैं। यहां के किसानों का कहना है कि कीटनाशक किसान को धोखा दे सकते हैं लेकिन फसलों में मौजूद शाकाहारी तथा मासाहारी कीट किसान को धोखा नहीं देते। किसानों का मानना है कि अगर किसान अपनी फसल में किसी भी प्रकार के कीटनाशक का प्रयोग नहीं करे तो मासाहारी कीट ही उसकी फसल में कीटनाशक का काम कर देते हैं और उनकी थाली भी जहर से मुक्त हो सकती है।  
68 किस्म के कीटनाशक हो चुके हैं कैंसरकार घोषित
 किसान पाठशाला में मौजूद किसानों का फाइल फोटो। 


 महिला किसान पाठशाला में भाग लेती महिलाएं।
देश में 223 किस्म के कीटनाशक रजिस्टर्ड हैं। इनमें से 68 किस्म के ऐसे कीटनाशक, खरपतवार नाशक तथा फफुंदनाशी हैं जिन्हें यू.एस.ए. की पर्यावरण सुरक्षा एजैंसी कैंसरकारक घोषित कर चुकी है लेकिन इसके बावजूद भी ये कीटनाशक धड़ले से बिक रहे हैं। 

पूरा वर्ष चर्चा में बने रहे किसान

अपने इस अनोखे प्रयोग के कारण निडाना तथा ललितखेड़ा के किसान पूरा वर्ष यहां के किसानों तथा कृषि विभाग के लिए चर्चा का विषय बने रहे। किसानों तथा कीटों के बीच पिछले 40 वर्षों से चली आ रही जंग को खत्म करवाने के लिए लगातार 18 सप्ताह तक खाप पंचायतों का आयोजन कर खाप के चौधरियों को भी कीटों की पढ़ाई पढऩे के लिए मजबूर कर दिया। इसके अलावा पंजाब जैसे प्रगतिशील प्रदेश के किसानों को भी कीटों की पढ़ाई पढ़ाकर कीटनाशकों से बचने का एक अचूक शस्त्र थमा दिया। अपनी इस अनोखी पढ़ाई के कारण यहां के किसानों ने सत्यमेव जयते, रेडियो, दूरदर्शन सहित अन्य चैनलों के माध्यम से देश में कीटनाशक रहित खेती की अलख जगाई। 

तेजी से बढ़ रहा है कीटनाशकों के प्रयोग का ग्राफ

20 वर्षों में कीटनाशकों के प्रयोग का ग्राफ काफी तेजी से बढ़ा है। अकेले ङ्क्षहदुस्तान में लगभग 40 हजार करोड़ के कीट रसायनों, लगभग 50 हजार करोड़ के खरपतवार नाशकों तथा लगभग 30 हजार करोड़ बीमारी, फफुंद व जीवाणु नाशक रसायनों का कारोबार होता है। इस कारोबार से होने वाली आमदनी का 80 से 90 प्रतिशत हिस्सा विदेशों में जा रहा है। इसमें से जींद जिले के राजपुरा भैण गांव में कीटनाशकों का सबसे ज्यादा प्रयोग होता है। अकेले 3 करोड़ के कीटनाशक राजपुरा भैण के किसान खरीदते हैं। 

पुरुषों के साथ-साथ कंधे से कंधा मिलाकर चल रही हैं महिलाएं 

निडाना तथा ललितखेड़ा की महिलाएं भी किसानों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चल रही हैं। इन महिलाओं ने भी पुरुषों की तर्ज पर लगभग 20 सप्ताह तक महिला किसान खेत पाठशाला का आयोजन कर खेतों में नए-नए प्रयोग कर अपनी दक्षता  का परिचय दिया। इतना ही नहीं इन महिलाओं ने तो पुरुषों से आगे निकलते हुए कीटों पर गीतों की रचना भी की हुई है। इस पाठशाला में निडानी, निडाना तथा ललितखेड़ा से 70 के लगभग महिलाएं जुड़ चुकी हैं और ये सभी महिलाएं अपने खेतों में एक छटांक भी जरह का इस्तेमाल नहीं करती हैं। 

तेजी से ऊपर जा रहा महिला उत्पीडऩ की घटनाओं का ग्राफ


जींद। महिलाओं पर बढ़ रहे उत्पीडऩ तथा यौन शोषण की घटनाओं के आगे कानून की तमाम धाराएं तथा सरकार की नीतियां बौनी साबित हो रही हैं। महिलाओं की सुरक्षा के लिए उठाए जा रहे कदमों के बावजूद भी अत्याचार तथा यौन शोषण की घटनाओं पर लगाम लगने के बजाए लगातार ग्राफ ऊपर जा रहा है। जिले में बलात्कार तथा घरेलू ङ्क्षहसा के मामले का आंकड़ा पिछले वर्षों के मुकाबले दोगना हो गया है। वर्ष 2012 में अब तक जिले में 34 बलात्कार के मामले पुलिस ने दर्ज करके 56 आरोपियों को गिरफ्तार किया। इसी तरह महिलाओं पर घरों में हो रहे अन्य अत्याचार के 460 मामले जिला प्रोटैक्शन अधिकारी के पास पहुंचे लेकिन महिलाओं पर बढ़ रहे अत्याचार पर रोक लगाने के लिए ठोस कानून नहीं होने के चलते इस पर लगाम नहीं लग पा रही है। महिला एवं बाल विकास विभाग की तरफ से महिलाओं पर हो रहे अत्याचार रोकने के लिए कानून का प्रचार प्रसार करके जागरूक किया जा रहा है। अभियानों के बावजूद भी लोगों की मानसिकता नहीं बदल पा रही है। घृणित मानसिकता के चलते ही महिलाओं पर घरेलू हिंसा तथा यौवन शोषण के मामले बढ़ रहे हैं। ऐसे में हिंसा का शिकार होने वाली महिलाओं की फरियाद लगाने के आंकड़ों में कोई कमी नहीं आ रही है और प्रति वर्ष घरेलू हिंसा के आंकड़ों का ग्राफ ऊपर ही जा रहा है। यह आंकड़ा तो प्रशासन के पास पहुंच रहे मामलों का है, महिलाओं की एक बड़ी संख्या ऐसी भी है जो लोकलाज, रिश्ते टूटने व कोर्ट, कचहरी के चक्कर काटने से डरती है। इसलिए वे ऐसी योजना का फायदा नहीं उठा पाती हैं और ऐसे में यह मामले सामने नहीं आ पाते। 

हर वर्ष बढ़ रही हिंसा


महिलाओं पर होने वाले अत्याचारों को रोकने के लिए सरकार द्वारा वर्ष 2005 में घरेलू हिंसा महिला संरक्षण अधिनियम लागू किया था। महिला एवं बाल विकास निदेशालय द्वारा प्रदेश के सभी जिलों में महिला प्रोटैक्शन अधिकारियों की नियुक्ति की थी। इसके बावजूद आज भी कुछ लोगों द्वारा कानून की अवमानना की जा रही है। पिछले 3 साल में घरेलू हिंसा के 881 मामले सामने आए हैं। वर्ष 2009 में घरेलू हिंसा के 128 अंक मामले सामने आए हैं। वर्ष 2010 में 141 घरेलू हिंसा के सामने आए। वर्ष 2011 में यह आंकड़ा बढ़ते हुए 152 पर पहुंच गया। जबकि 2012 में यह आंकड़ा कई गुना बढ़ गया। जहां 3 वर्षो में कुल 421 मामले सामने आए, वहीं वर्ष 2012 में 460 मामले सरकारी आंकड़ों में दर्ज हुए हैं। बलात्कार की घटनाओं का आंकड़ा भी लगभग दोगना हो गया है। वर्ष 2011 में बलात्कार के लगभग 23 मामले प्र्रकाश में आए थे, जबकि 2012 में 34 महिलाओं को यौवन शोषण हुआ। ऐसे में आंकड़ों से अनुमान लगाया जा सकता है कि घरेलू हिंसा अधिनियम भी इस पर रोक लगाने में कामयाब नहीं हो पा रहा हैं। 
कठोर कानून बने


प्राचार्य निर्मला रोहिल्ला
रोहिल्ला स्कूल की प्राचार्य निर्मला रोहिल्ला ने कहा कि महिलाओं पर अत्याचार को रोकने के लिए कठोर कानून की जरूरत है। इसके लिए देश के कानून में संशोधन करके रेप जैसे जघन्य अपराध को अंजाम देने वालों को फांसी का प्रावधान करना होगा। जब तक कानून में कठोर प्रावधान नहीं किए जाएंगे तब तक महिलाओं पर हो रहे अत्याचारों पर अंकुश नहीं लग पाएगा। इसलिए सरकार को जल्द से जल्द कानून में संशोधन करना चाहिए। 

फास्ट कोर्ट की जाए स्थापित


प्राचार्या सविता भोला 
श्रीराम पब्लिक स्कूल की प्राचार्या सविता भोला ने कहा कि गैंगरेप तथ महिलाओं के साथ अत्याचार करने वाले लोगों को जल्द से जल्द सजा देने के लिए फास्ट कोर्ट बनाने की आवश्यकता है। फास्ट कोर्ट न होने के चलते आरोपी लोगों को कई-कई वर्षो तक सजा नहीं मिल पाती है। जिसके चलते अपराधियों के हौंसले बुलंद हो जाते है। देशभर में फास्ट कोर्ट स्थापित करके गैगरेप करने वाले लोगों को फांसी की सजा दी जाए। 

मानसिकता बदलने की आवश्यकता

चेयरपर्सन वीणा देशवाल
जिला परिषद की चेयरपर्सन वीणा देशवाल ने कहा कि आज समाज में महिलाओं के साथ अत्याचार बढऩे का मुख्य कारण लोगों की बिगड़ती मानसिकता है। लोगों की घृणित मानसिकता के चलते महिलाओं तथा छात्राओं के साथ छेड़खानी की घटनाएं बढ़ रही हैं। इसके लिए शिक्षण संस्थाओं में भी छात्र-छात्राओं को इसके लिए जागरूक करने की आवश्यकता है। 

सुरक्षा बढ़ाई जाए

छात्रा रीना ने कहा कि छात्राओं के साथ छेड़खानी की घटनाएं आम हो चुकी है। इसके लिए प्रशासन को चाहिए कि सभी शिक्षण संस्थाओं के बाहर सुरक्षा बढ़ाई जाए तथा ग्रामीण क्षेत्रों से आने वाली बसों में भी पुलिस कर्मचारी तैनात किए जाए। शिक्षण संस्थाओं में आने वाली छात्राओं को रास्तों में मनचले युवकों के अत्याचार का सामना करना पड़ता है। इसके लिए कठोर कदम उठाए जाए। 

जहरमुक्त खेती को बढ़ाने के लिए जिला प्रशासन तैयार कर रहा एक्शन प्लान


प्रदेश के किसानों के लिए रोल माडल बनेंगे जींद जिले के किसान
निडाना तथा ललितखेड़ा के किसान पढ़ाएंगे कीटों की पढ़ाई

जींद। कीटनाशक रहित खेती को बढ़ावा देने में जींद जिला प्रदेश के किसानों के लिए रोल मॉडल के रूप में उभरेगा। किसानों तथा कीटों के बीच पिछले 4 दशकों से चल रही जंग को समाप्त करने में निडाना और ललितखेड़ा गांव के किसान अहम भूमिक निभाएंगे। निडाना तथा ललित के किसानों द्वारा शुरू की गई इस मुहिम को आगे बढ़ाने के लिए जिला प्रशासन ने अब इन किसानों का हाथ थाम लिया है। लोगों की थाली को जहरमुक्त करने तथा बेजुबान कीटों को बचाने के लिए अब जिला प्रशासन के सहयोग से निडाना तथा ललितखेड़ा गांव के मास्टर ट्रेनर किसान पूरे जिले में कीटनाशक रहित खेती की अलख जाएंगे। जहरमुक्त खेती की इस मुहिम को आगे बढ़ाने के लिए जिला प्रशासन ने कृषि विभाग तथा बागवानी विभाग के अधिकारियों के हाथों में इस मुहिम की कमान सौंपने का निर्णय लिया है। किसानों के इस अभियान को सफल बनाने के लिए जिला प्रशासन द्वारा एक्शन प्लान तैयार किया जा रहा है। जिला प्रशासन जल्द ही इस प्लान पर अमल शुरू करने जा रहा है। 

जींद ब्लॉक से होगी मुहिम की शुरूआत

जिले के किसानों को कीटनाशक रहित खेती का पाठ पढ़ाने के लिए जल्द ही जिला प्रशासन द्वारा निडाना तथा ललितखेड़ा गांव के किसानों के सहयोग से एक विशेष मुहिम शुरू की जाएगी। निडाना तथा ललितखेड़ा गांव के मास्टर ट्रेनर जिले के अन्य गांवों में पाठशाला लगाकर किसानों को शाकाहारी तथा मासाहारी कीटों की पहचान के साथ-साथ उनके क्रियाकलापों के बारे में भी विस्तार से जानकारी देंगे। जिले के सभी गांवों में पाठशाला लगाने के लिए जिला प्रशासन मास्टर ट्रेनर किसानों को हर सुविधा मुहैया करवाएगा। सबसे पहले इस अभियान की शुरूआत जींद ब्लाक से की जाएगी। 

जिला प्रशासन किसानों का करेगा पूरा सहयोग

डा. युद्धवीर सिंह ख्यालिया
उपायुक्त, जींद

आज किसान अधिक उत्पादन की चाह में अंधाधुंध कीटनाशकों का प्रयोग कर रहे हैं। फसलों में कीटनाशकों के अधिक प्रयोग के कारण हमारा खान-पान जहरीला हो रहा है। लोगों की थाली को जहर मुक्त बनाने के लिए निडाना तथा ललितखेड़ा गांव के किसानों ने अपना खुद का कीट ज्ञान पैदा कर एक नई क्रांति को जन्म दिया है। यहां के किसानों ने मासाहारी तथा शाकाहारी कीटों एक अच्छा शोध किया है। अपने इस कीट ज्ञान के बूते ही ये किसान बिना कीटनाशकों का प्रयोग किए ही अच्छा उत्पादन ले रहे हैं। डा. सुरेंद्र दलाल ने किसानों के सहयोग से इस अभियान की शुरूआत की है। इनकी इस मुहिम को पूरे जिले में फैलाने के लिए जिला प्रशासन द्वारा इनका सहयोग किया जाएगा। बागवानी तथा कृषि विभाग के अधिकारियों को इस मुहिम को  सफल बनाने की जिम्मेदारी दी जाएगी। इसके लिए प्रशासन द्वारा एक एक्शन प्लान तैयार किया जा रहा है। सोमवार को कृषि तथा बागवानी विभाग के अधिकारियों की बैठक बुलाकर इस एक्शन प्लान पर अमल किया जाएगा। 



प्रशासन के सहयोग से अभियान को मिलेगा बल

किसान जानकारी के अभाव में बेजुबान कीटों को मार रहे हैं। पिछले लगभग 4 दशकों से किसानों तथा कीटों 
डा. सुरेंद्र दलाल
पाठशाला के संचालक

के बीच यह जंग चली आ रही है लेकिन निडाना तथा ललितखेड़ा गांव के किसानों ने खुद का कीट ज्ञान पैदा किया है। यहां के किसानों ने मासाहारी तथा शाकाहारी कीटों की पहचान की और उनके क्रियाकलापों के बारे में पूरी जानकारी जुटाई है। ना तो कीट हमारे मित्र हैं और ना ही हमारे दुश्मन। कीट तो अपना जीवन यापन करने के लिए फसल में आते हैं। कीट पौधों के परागन में विशेष भूमिका निभाते हैं। पौधे अपनी जरूरत के अनुसार भिन्न-भिन्न प्रकार की सुगंध छोड़कर कीटों को आकॢषत करते हैं। इसलिए हमें कीटों तथा पौधों की भाषा तथा कीटों के क्रियाकलापों को समझने की जरूरत है। जिला प्रशासन द्वारा इस मुहिम में किसाानों का सहयोग करने से इस अभियान को काफी बल मिलेगा और सभी लोगों को इस मुहिम में अपना योगदान देना चाहिए, क्योंकि यह किसी व्यक्ति विशेष या समुदाय की समस्या नहीं, बल्कि पूरे समाज की समस्या है। 
डा. सुरेंद्र दलाल
पाठशाला के संचालक

Saturday, 19 January 2013

विटामिन डी के प्रति लोग जागरूक नहीं : डॉ. रीतू


जींद : डाइटीशियन विशेषज्ञ डॉ. रीतू राघव ने कहा कि विटामिन डी की कमी से अनेक रोग बढ़ रहे हैं, लेकिन लोग इसके प्रति कम जागरूक है। अब धूप से बचना ज्यादा पसंद किया जा रहा है। घर हो या दफ्तर लोग काम में व्यस्त रहते है और धूप में नहीं निकल पाते। बच्चों को भी बाहर खेलने कम भेजा जाता है। टीवी, इंटरनेट और मोबाइल गेम ने भी स्थिति बिगाड़ी है। वह शनिवार को पत्रकारों से बातचीत कर रही थी। विटामिन-डी की कमी एक आम समस्या है, लेकिन ज्यादातर लोगों को इसकी पर्याप्त जानकारी नहीं है। विटामिन-डी की कमी का कारण हड्डियों के रोग सहित कई अन्य घातक बीमारिया हो सकती है। विटामिन डी की कमी के लक्षण आमतौर पर बहुत विलंब से पता चलते हैं। यदि हम अपने आहार में विटामिन डी को शामिल करे तो इसके दुष्प्रभावों से बचा जा सकता है। मासाहारी लोगों के लिए तो ये स्त्रोत पर्याप्त हैं, परंतु शाकाहारी लोगों द्वारा विटामिन-डी मिश्रित भोजन लेने से इस कमी को पूरा किया जा सकता है। विटामिन डी की सबसे ज्यादा आवश्यकता गर्भवती स्त्री व छोटे बच्चों को होती है। यदि उन्हे विटामिन डी उपलब्ध न कराया जाए तो गर्भ में पल रहे बच्चे तथा छोटे बच्चों की हड्डिया कमजोर पड़ सकती है। ऐसे में विटामिन डी को अपनी डाइट में अवश्य शामिल करना चाहिए। प्रमुख दवा कंपनी सिपला के जोन मैनेजर सुरेद्र सैनी ने कहा कि देश में 84 प्रतिशत लोग विटामिन डी की कमी से जूझ रहे है। इनमें भी तीन प्रतिशत लोग ही विटामिन डी की कमी पर जागरूक होकर इलाज पा रहे है। लोग बीमारी झेलते रहते है, लेकिन जाच नहीं करवाते। धूप विटामिन डी लेने का सबसे बेहतर जरिया है। हर दिन 11 बजे से तीन बजे के बीच कम से कम तीस मिनट भी शरीर के 40 प्रतिशत हिस्से को धूप दी जाए तो शरीर में विटामिन डी की पूर्ति हो सकती है। लोग भोजन तो खूब पौष्टिक लेते है, लेकिन विटामिन डी कितना उसमें है, इसके प्रति जागरूक नहीं है। दूध, मक्खन, मछली व मशरूम से कुछ मात्रा में विटामिन डी मिलता है, लेकिन इनका प्रयोग कम ही हो पाता है। धूप में ना निकल पाने वाले लोग बाजार से बेहतर दवाई भी विटामिन डी की पूर्ति के लिए ले सकते है। विटामिन डी की कमी का प्रभाव हर आयु वर्ग पर पड़ रहा है। औसतन शरीर में 30 नैनोग्राम विटामिन डी की जरूरत होती है। मानव शरीर में 20 से 30 नैनोग्राम विटामिन डी को नॉर्मल कमी माना जाती है जबकि 10 से 20 नैनोग्राम विटामिन डी होना नुकसानदायक है। सर्दियों के सीजन में ज्यादातर कमी होती है। इससे हड्डी व जोड़ों में दर्द, कमर दर्द, अस्थमा, कैंसर, डायबिटिज, मासपेशियों का खिंचाव, ऐंठन तथा थकान व कमजोरी जैसे रोग पैदा हो रहे है। इस अवसर पर लोकेश बंसल, दीपक, विशाल भास्कर आदि मौजूद थे।

Friday, 11 January 2013

सैनिकों की हत्या पर बढ़ा जनाक्रोश

जींद : पाकिस्तानी सैनिकों द्वारा भारतीय सैनिकों की नृशंस हत्या और सैन्य धर्म की सारी मर्यादाओं को लांघकर उनके सिर अपने साथ ले जाने के कुकृत्य के लिए विभिन्न सामाजिक और धार्मिक संगठनों ने शहर में प्रदर्शन किया और पाकिस्तान का पुतला फूंका। प्रदर्शन में विश्व हिंदु परिषद, बजरंग दल, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, आर्य समाज, गोभक्त मंडल, कीर्तन मंडल आदि के पदाधिकारियों ने भाग लिया और झांझ गेट पर विश्व हिंदु परिषद के अध्यक्ष फूल कुमार शास्त्री की अध्यक्षता में पुतला फूंका। जिलाध्यक्ष ने कहा कि पाकिस्तान एक प्रभुसत्ता संपन्न देश न होकर आतंकवादियों, अनाचारियों व विधर्मियों का अड्डा बनकर रह गया है। अब समय आ गया है कि भारत सहित विश्व के सभी देश पाकिस्तान सैनिकों के इस अभद्रता व बर्बरता पूर्ण कृत्य पर सोचकर उसको सुधारने का काम करें। पाकिस्तान के सैनिकों की यह बौखलाहट सैन्य धर्मो के उल्लंघन की पराकाष्ठा है। भारत सरकार इस पर चुप न बैठकर उसे दंडित करें। जिला उपाध्यक्ष महेश मंगला ने कहा कि इस प्रकार सैनिक पत्यिों के माथे पर उतरा सिंदूर तथा गया हुआ नन्हे-मुन्नों का सहारा पाकिस्तान की कफन में कील का काम करेगा। भारत के लोग इस दुष्कृत्य पर हाथ पर हाथ धरकर नहीं बैठेंगे। सरकार इस पर सख्त से सख्त कार्रवाई करें। आर्य समाज हरियाणा के उपाध्यक्ष प्रो. ओम कुमार ने कहा कि इस प्रकार का सेना के नियमों का उल्लंघन यह दर्शाता है कि पाकिस्तान में अब सरकार नाम की कोई चीज न होकर वहां पर आतंकवादियों का तांडव नृत्य हो रहा है, जिसका भयावह दृश्य हम तक भी पहुंच रहा है। यदि अब भी भारत सरकार नहीं जागी तो इसके भयंकर परिणाम हो सकते हैं। बजरंग दल के संयोजक नरेंद्र शर्मा ने कहा कि अब समय आ गया है कि भारत की 120 करोड़ जनता पाकिस्तान के इस दुस्साहस का करारा जवाब दें। आर्य समाज से रमेश आर्य ने कहा कि देश के सैनिक देश की सीमाओं की रक्षा करते-करते शहीद होते रहते हैं, लेकिन देश के वीर बांकुरों की क्रूर व नृशंस हत्या देश के लिए शर्म की बात है। भारत सरकार पाकिस्तान के इस शर्मनाक कृत्य पर तुरंत कार्रवाई करें। सरकार से मांग की गई कि सरकार कारगिल के शहीदों की तर्ज पर इन जांबाजों के आश्रितों को भी सहायता प्रदान करें। इस अवसर पर प्रो. दया सिंह, राधेश्याम मित्तल, बलवान, रवींद्र, रविदत्त शास्त्री, प्रदीप सिंगरोहा, रिंकू जागड़ा, ओमपाल नैन, सुशील सोपर्ण, मदनलाल शास्त्री, रामदास शास्त्री आदि मौजूद थे। वहीं महात्मा गांधी संस्थान में संगोष्ठी का आयोजन किया गया। इसमें भारत-पाक सीमा पर शहीद हुए जवान नायक हेमराज एवं नायक सुधारक को श्रद्धांजलि दी गई। संस्थान के निदेशक राजकुमार भोला ने कहा कि पाक सैनिकों का इस प्रकार का कृत्य समस्त मानवता के खिलाफ है। इस प्रकार का कृत्य उनकी धार्मिक कट्टरता एवं संकीर्ण मानसिकता को परिभाषित करता है। मानवता विरोधी इस प्रकार के कृत्यों पर कठोर कार्रवाई की जानी चाहिए ताकि इस प्रकार के मानवता विरोधी कृत्यों पर लगाम लगाई जा सके। इस अवसर पर डॉ. देवेंद्र, राजवीर, मेजर राजवीर सिंह आदि मौजूद थे।

खुद को पर्यावरण के लिए महिला वकील ने कर दिया समर्पित

अब तक लगवा चुकी 177 त्रिवेणी जींद। महिला एडवोकेट संतोष यादव ने खुद को पर्यावरण की हिफाजत के लिए समर्पित कर दिया है। वह जींद समेत अब तक...